मुख्यपृष्ठस्तंभबेबाक : ईडी की नजर विपक्ष पर ही क्यों?

बेबाक : ईडी की नजर विपक्ष पर ही क्यों?

अनिल तिवारी, मुंबई

प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी का काम आर्थिक अपराध, मनी लॉन्ड्रिंग और बड़े वित्तीय घोटालों की निष्पक्ष जांच करना है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसका नाम सुनते ही आम धारणा जांच एजेंसी से ज्यादा राजनीतिक दबाव के औजार की बनती जा रही है। आम आदमी पार्टी के नेता दीपक सिंगला की गिरफ्तारी भी इसी बहस को फिर तेज करती है। रिपोर्टों के अनुसार ईडी ने दिल्ली-गोवा में छापेमारी के बाद सिंगला को बैंक धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तार किया है; कुछ रिपोर्टों में यह मामला १५५ करोड़ रुपए के बैंक फ्राड से जुड़ा बताया गया है।
मामला ठंडे बस्ते में
पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री सुजीत बसु को नगरपालिका भर्ती घोटाले में गिरफ्तार किया गया, कर्नाटक के कांग्रेस विधायक केसी वीरेंद्र पर अवैध सट्टेबाजी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग आरोप लगे और नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी-राहुल गांधी तक को घेरा गया। अर्थात, पिछले एक दशक में ईडी को सत्ता पक्ष में कोई बड़ा मामला दिखा ही नहीं, जिन पर बड़े-बड़े आरोप लगे, उनके भाजपावासी होते ही मामला लगभग सिमट गया। ऐसे प्रमुख नामों में अजीत पवार, प्रफुल्ल पटेल, प्रताप सरनाइक, छगन भुजबल, हिमंत बिस्वा सरमा, अशोक चव्हाण, शुभेंदु अधिकारी, हसन मुश्रीफ, भावना गवली, यामिनी जाधव, यशवंत जाधव, सी. एम. रमेश, रणिंदर सिंह, संजय सेठ, कृपाशंकर सिंह, दिगंबर कामत, नवीन जिंदल, तापस रॉय, बाबा सिद्दीकी और के. गीता जैसे नाम शामिल हैं। इनमें कुछ मामलों में जांच बंद हुई, कुछ में कार्रवाई धीमी पड़ी या मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
ईडी की निष्पक्षता पर सवाल
इधर, पिछले दस वर्षों में भाजपा से असहमति रखने वाले विपक्षी नेताओं के ईडी की कार्रवाई के दायरे में आने की सूची लंबी होती चली गई। इनमें आम आदमी पार्टी से अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन, संजय सिंह, दीपक सिंगला और संजीव अरोड़ा; शिवसेना से संजय राऊत; एनसीपी से अनिल देशमुख और नवाब मलिक; झारखंड मुक्ति मोर्चा से हेमंत सोरेन; कांग्रेस से पी. चिदंबरम, कार्ति चिदंबरम, डी.के. शिवकुमार, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कर्नाटक विधायक केसी वीरेंद्र; तृणमूल कांग्रेस से अभिषेक बनर्जी, पार्थ चटर्जी, अनुब्रत मंडल, सुजीत बसु; राजद से लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव; नेशनल कॉन्फ्रेंस से फारूक अब्दुल्ला; पीडीपी से महबूबा मुफ्ती; बीआरएस से के. कविता जैसे कई नाम शामिल रहे हैं। कई मामलों में गिरफ्तारी हुई, कई में पूछताछ, छापेमारी हुई, अनेक मामले अभी भी पर्याप्त सबूतों के अभाव में अदालतों में लंबित हैं। २०१४ से २०२२ के बीच ईडी की जांच के दायरे में आए १२१ प्रमुख नेताओं में ११५ विपक्ष से थे, यानी करीब ९५ प्रतिशत। वहीं, २०२५ में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार दस वर्षों में १९३ राजनीतिक नेताओं पर ईडी ने मामले दर्ज किए, लेकिन केवल दो मामलों में सजा हुई। २०१४ के बाद से केंद्रीय एजेंसियों की जांच झेल रहे २५ विपक्षी नेता भाजपा या भाजपा-नीत गठबंधन में गए और उनमें से २३ को किसी न किसी रूप में राहत मिल गई। यही असंतुलन ईडी की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। क्या सत्ता पक्ष में सब दूध के धुले हैं? या जांच एजेंसी की आंखें सत्ता के दरवाजे पर पहुंचकर अपने-आप बंद हो जाती हैं?
कानून का डंडा विपक्ष पर
लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता केवल छापों से नहीं, बल्कि निष्पक्षता और अदालत में सिद्ध परिणामों से बनती है। सरकार द्वारा राज्यसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार २०१५ से २०२५ के बीच ईडी ने पीएमएलए के तहत ५,८९२ मामले लिए, लेकिन उस समय तक केवल १५ लोगों को सजा हुई थी। यह आंकड़ा अपने-आप में सवाल उठाता है कि क्या एजेंसी का जोर मुकदमे को साबित करने से अधिक राजनीतिक संदेश देने पर है? नेशनल हेराल्ड मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने ईडी की मनी लॉन्ड्रिंग शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार किया था, हालांकि जांच जारी रखने की छूट दी गई। यह फैसला भी बताता है कि हर सनसनीखेज आरोप अदालत में उतना मजबूत नहीं निकलता।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है, क्या भाजपा-शासित नगरपालिकाओं, राज्य सरकारों और केंद्र से जुड़े तंत्र में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ? अगर हुआ है, तो वहां ईडी की तेजी क्यों नहीं दिखती? कानून का डंडा अगर केवल विपक्ष पर चले और सत्ता के दरवाजे पर नरम पड़ जाए, तो वह न्याय नहीं, चयनात्मक कार्रवाई कहलाएगी। लोकतंत्र में भ्रष्टाचार से लड़ाई जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि जांच एजेंसी सत्ता की नहीं, संविधान की एजेंसी दिखाई दे।
इसलिए यहां सवाल यह नहीं है कि किसी विपक्षी नेता की जांच क्यों हो रही है। अगर भ्रष्टाचार हुआ है तो जांच होनी ही चाहिए। सवाल यह है कि जांच की दिशा हमेशा विपक्ष की गलियों में ही क्यों मुड़ती है? ईडी की सक्रियता सत्ता पक्ष की ओर उतनी ही तीव्रता से क्यों नहीं दिखती?

अन्य समाचार