भरतकुमार सोलंकी
मुंबई
देशभर में धार्मिक स्थलों पर चोरी की बढ़ती घटनाएं, मंदिरों के दानपात्रों से धन गायब होने की खबरें और कहीं-कहीं धार्मिक संस्थाओं के वित्तीय प्रबंधन पर उठते प्रश्न एक गंभीर चिंतन की ओर संकेत करते हैं। लेकिन क्या इन घटनाओं से भी बड़ा सवाल यह नहीं है कि आखिर धर्मादा का इतना बड़ा धन आता कहां से है, किस उद्देश्य से आता है और उसका उपयोग किस प्रकार होना चाहिए? क्या ईश्वर को वास्तव में हमारे धन की आवश्यकता है? यदि नहीं, तो फिर हम दान किसे दे रहे हैं-ईश्वर को, समाज को या अपने मन की संतुष्टि के लिए? और यदि दान समाज के हित के लिए है, तो क्या दान देने वाले का यह अधिकार नहीं बनता कि वह यह भी पूछे कि उसके धन का उपयोग कहां और वैâसे हुआ?
एक और सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्या धर्म के नाम पर एकत्रित धन को अपनी निजी उपलब्धि या निजी संपत्ति समझ लेना उचित है? क्या किसी धार्मिक संस्था का पद सेवा का माध्यम है या अधिकार और प्रभाव का साधन? यदि किसी व्यवसाय में निवेश करने वाला निवेशक कंपनी का हिसाब मांग सकता है, तो क्या धर्मादा में योगदान देने वाला श्रद्धालु पारदर्शिता की अपेक्षा नहीं रख सकता? यह भी सच है कि बिना प्रमाण किसी संस्था या व्यक्ति पर आरोप लगाना उचित नहीं है। लेकिन क्या पारदर्शिता से बचना भी उतना ही उचित है? यदि आय-व्यय का नियमित सार्वजनिक विवरण, स्वतंत्र ऑडिट, आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था और जवाबदेही की स्पष्ट प्रणाली हो, तो क्या समाज का विश्वास और अधिक मजबूत नहीं होगा? सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कहीं हम धर्म और धार्मिक दिखावे में अंतर करना तो नहीं भूल गए? कई बार एक व्यक्ति किसी परंपरा को देखकर उसका अनुसरण करता है। फिर दूसरा, तीसरा और चौथा भी वही करने लगता है। धीरे-धीरे परंपरा का उद्देश्य पीछे छूट जाता है और केवल उसका बाहरी स्वरूप बचता है। तब व्यक्ति को लगता है कि वह धर्म कर रहा है, जबकि संभव है कि वह केवल एक सामाजिक परंपरा या दिखावे का पालन कर रहा हो। भगवान को सोने-चांदी, महंगे आभूषण या विशाल चढ़ावे की आवश्यकता नहीं है। यदि ईश्वर सर्वसमर्थ हैं, तो उन्हें हमारे धन की नहीं, हमारे सदाचार, सत्यनिष्ठा, करुणा और सेवा की आवश्यकता है। यदि समाज का कोई गरीब बच्चा शिक्षा से वंचित है, कोई रोगी उपचार के अभाव में पीड़ित है या कोई परिवार भूखा है, तो क्या वहां किया गया सहयोग भी उतना ही बड़ा धर्म नहीं है? इसलिए समय आ गया है कि हम केवल दान की राशि पर नहीं, बल्कि दान की दिशा पर भी विचार करें।
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)
