-ड्रैगन की दमन नीति के खिलाफ आत्मदाह
-अंतर्राष्ट्रीय महाशक्तियों की चुप्पी और निष्क्रियता पर सवाल
संतोषी रावत
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर ४२ वर्षीय तिब्बती नागरिक लोब्गा रंगजेन द्वारा आत्मदाह की आत्मघाती घटना ने एक बार फिर तिब्बत की आजादी के संघर्ष को वैश्विक पटल पर लाकर खड़ा कर दिया है। घटनास्थल से मिला ‘ण्प्घ्र्A ध्ळऊ ध्इ ऊघ्ँEऊ’ (चीन तिब्बत से बाहर निकलो) का संदेश सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि दशकों से दबे तिब्बती समुदाय के आक्रोश, बेबसी और उनकी अस्मिता की चीख है।
यह घटना कोई अकेली मिसाल नहीं है। वर्ष २००९ से अब तक १५० से अधिक तिब्बती चीनी दमन के खिलाफ खुद को आग के हवाले कर चुके हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर कोई समुदाय इस कदर मजबूर क्यों है कि उसे अपनी आवाज दुनिया तक पहुंचाने के लिए जिंदगी की सबसे दर्दनाक आहुति देनी पड़ रही है?
ऐतिहासिक संदर्भ और दमन की नीति
चीन जिसे ‘शांतिपूर्ण एकीकरण’ कहता है, तिब्बतियों के लिए वह उनकी संप्रभुता और संस्कृति का अपहरण था। १७ सूत्रीय समझौते के बाद चीनी सेना ने तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया।
दलाई लामा की तिब्बत वापसी, पंचेन लामा की रिहाई और मानवाधिकारों की बहाली जैसी बुनियादी मांगें आज भी अधूरी हैं। तिब्बत की अनूठी बौद्ध संस्कृति और भाषा को चीनी सांचे में ढालने की लगातार कोशिशें हो रही हैं।
तिब्बत के भीतर विरोध की आवाज उठाने या उसकी जानकारी दुनिया तक पहुंचाने वालों पर चीनी प्रशासन का क्रूर शिकंजा कसा रहता है।
यह आत्मदाह वैश्विक बिरादरी की अंतरात्मा पर एक गहरा घाव है। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की दहलीज पर जब कोई अपनी जान देता है, तो वह सीधे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय महाशक्तियों की चुप्पी और निष्क्रियता पर सवाल उठाता है।
एक ऐसे दौर में जब दुनिया मानवाधिकारों और स्वतंत्रता की बड़ी-बड़ी बातें करती है, तिब्बतियों का यह हिंसक आत्म-बलिदान भू-राजनीतिक हितों के आगे कुचली जा रही मानवीय संवेदनाओं का गवाह है। चीन भले ही बलपूर्वक तिब्बत की आवाज दबा दे, लेकिन ‘प्रâी तिब्बत’ की यह चिंगारी दुनिया के कोने-कोने में रह रहे तिब्बतियों के दिलों में आज भी सुलग रही है।
