उमन गुप्ता
प्रसिद्ध पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का ३ जुलाई २०२६ से दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन लगातार जारी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि लद्दाख से जुड़े संवैधानिक और पर्यावरणीय मुद्दों पर केंद्र सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है, जिसके कारण उन्हें दोबारा आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा। वांगचुक का आंदोलन किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि लद्दाख की पहचान, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए है। लेकिन मोदी सरकार है कि कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है।
सेहत को लेकर बढ़ी चिंता
अनशन के दौरान उनकी सेहत को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लगातार उपवास के कारण उनका वजन कम हुआ है और स्वास्थ्य संबंधी कुछ मानकों में गिरावट दर्ज की गई है। चिकित्सकों की निगरानी में उनका स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है, जबकि समर्थक सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। गौरतलब है कि इसी वर्ष मार्च में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत उनकी निरोधात्मक हिरासत समाप्त कर उन्हें रिहा किया था। उस समय सरकार ने कहा था कि लद्दाख में शांति और संवाद का वातावरण बनाने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया है। रिहाई के बाद वांगचुक ने भी बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की बात कही थी, लेकिन अब लेकिन इसमें अपेक्षित प्रगति नहीं होने के कारण उन्हें फिर आंदोलन करना पड़ रहा है।
लद्दाख तक सीमित नहीं रहेगा धरना
उधर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वांगचुक का यह आंदोलन केवल लद्दाख तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों जैसे व्यापक मुद्दों को भी राष्ट्रीय बहस का विषय बना रहा है। आने वाले दिनों में यदि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच वार्ता आगे बढ़ती है, तो यह लद्दाख के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों का आधार बन सकती है। फिलहाल, सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या केंद्र सरकार और सोनम वांगचुक के बीच जल्द कोई सकारात्मक संवाद स्थापित होता है या आंदोलन और अधिक व्यापक रूप लेता है।
