धनुर्धर
नवाचार यानी इनोवेशन की कोई सीमा नहीं है। फील्ड कोई भी हो अगर पूरे मनोयोग से किया जाए तो नवाचार उसके नए-नए आयाम उद्घाटित कर देता है। अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट ने यह बात पूरे विश्वासपूर्वक साबित की है। मंदिर की संपत्ति की लूट अपने देश में कोई नई चीज नहीं है। आस्थावान देश है तो इतना तो सबको मालूम है कि मंदिर में चढ़ावों की यहां कोई कमी नहीं होती और जब मंदिर में नियमित रूप से चढ़ावे आते रहेंगे तो जाहिर है, वहां दौलत जमा भी होती जाएगी।
लूट के किस्से
अपने यहां के मंदिरों में जमा होती दौलत के किस्से सैकड़ों साल पहले से देश-विदेश में कहे-सुने जाते रहे हैं। दौलत के भूखे लुटेरे बादशाहों तक जब ये किस्से पहुंचे तो वे खुद को नहीं रोक सके। लार टपकाते हुए यहां तक आ धमके और हमारे मंदिरों से सोना लूट-लूटकर अपने देश ले गए। इन लूट-खसोटों का पूरा ब्योरा आप बार-बार मंदिर आंदोलन और इस आंदोलन के जरिए सत्ता तक पहुंचे नेताओं के मुख से सुनते रहे हैं।
मंदिर के अंदर ड्यूटी
असल नवाचार की कथा अब शुरू होती है। विदेशी आक्रांताओं का किस्सा सुना-सुनाकर जब इन लोगों ने सत्ता पाई तो भक्तों के लिए विशाल मंदिर तो बनवाया ही, यह भी पक्का किया कि मंदिर में आनेवाले चढ़ावों को लूटने के लिए विदेशी लुटेरों के आने का कोई डर न रहे। इसके लिए, स्वदेशी लुटेरों की ड्यूटी मंदिर के अंदर ही लगा दी गई। उनकी जिम्मेदारी थी कि वे लूट की यह प्रक्रिया लगातार संचालित करते रहें। ऐसा न हो कि आलस्य के मारे साल-छह माह बैठे रह जाएं और चढ़ावा बढ़ता चला जाए।
लूट नहीं, चोरी
इन्हें मालूम था कि चढ़ावा एक हद से ज्यादा बढ़ा तो उसे दुनिया की लुटेरी ताकतों की नजर से छुपाना मुश्किल होगा और उन्हें दिख जाए तो फिर किसी न किसी तकनीक से वे इसे उड़ा ले जाएंगे। सो, मंदिर में तैनात देसी और स्वधर्मी लुटेरे पूरी निष्ठा और तत्परता से चढ़ावे की सफाई करते रहे। वैसे इन्हें लुटेरा कहना उचित नहीं। ये बलपूर्वक छीनकर माल नहीं ले जा रहे थे। छलपूर्वक चढ़ावे का एक बड़ा हिस्सा गायब कर दिया करते थे। सो, यह चोरी थी, लूट नहीं।
प्रबंधकों की असुरक्षा
और चोरी कर वे कहीं ‘चंपत’ भी नहीं होते थे। अगले दिन भी तो उन्हें अपनी ड्यूटी करनी होती थी। उपलब्ध रेकॉर्ड के मुताबिक ४० दिन में ७० बार चोरी हुई। लेकिन ४० दिन से पहले क्या यह टीम बैठी हुई थी? ऐसा इल्जाम नहीं लगाया जा सकता। सीसीटीवी फुटेज अगर इतने ही दिन के हैं तो इसमें इस टीम की क्या गलती है? इसे आप प्रबंधकों की असुरक्षा कहिए, उनके मन का डर कहिए कि वे रेकॉर्ड नष्ट करना जरूरी समझते थे। इस वजह से टीम की परफॉर्मेंस ढंग से दर्ज नहीं हो पा रही, वरना टीम की मेहनत और निष्ठा में कोई कमी नहीं है।
चोरी का सांस्कृतिक पक्ष
बहरहाल, बात तो नवाचार के फायदों की हो रही थी तो विदेशी लूट से देश के आस्तिकों को मुक्ति देने के लिए नियमित चौर्य कर्म की प्रवृत्ति को जिस नफासत के साथ स्थापित किया गया, वह हमारी गौरवशाली संस्कृति के अनुरूप ही है। यह भी इस नवाचार का ही एक फायदा हुआ कि इस चौर्य कर्म का सांस्कृतिक पक्ष इतनी प्रमुखता से उजागर हुआ। इसी मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बड़े नेताओं की एक अहम बैठक कर्नाटक में हो रही है और खबर है कि उसमें इस चोरी के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जाएगा।
धार्मिक पहलू
पूछनेवालों ने पूछ लिया कि एक सांस्कृतिक संगठन भला चोरी में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है? लेकिन उन्हें पता ही नहीं कि चोरी तो हमारे हजारों साल के इतिहास और संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा रही है। ताजा मामले में भी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक तत्व छिपे हैं। आप चाहें तो आसानी से इनकी पहचान कर सकते हैं। मसलन, चोरी की घटनाएं सामने आने के बाद जब विरोधियों ने इसे मुद्दा बनाना शुरू किया, तब उनके दुष्प्रचार को काटने के लिए जो अभियान सोशल मीडिया के धर्म ध्वजा वाहकों द्वारा चलाए गए, उनमें मुख्य यह था कि ‘मंदिर हिंदुओं ने बनवाया, उसका माल भी हिंदुओं ने उड़ाया तो तुम्हारा क्यों जी जल रहा है।’
धर्म का ठेका
इस एक वाक्य में सारे संदर्भ स्पष्ट हो जाते हैं। हिंदुओं के माल को लूटने के लिए, उनकी आस्था पर हमला करने के लिए दूसरे धर्म के लोगों की भला क्या जरूरत। हिंदू क्या इतने गए-गुजरे हैं कि अपने लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ भी नहीं कर सकते? इन्होंने करके दिखाया है। यह भी कोई संयोग नहीं कि इसके पीछे हिंदू धर्म का ठेका अपने नाम कर चुके लोग हैं। आप देख सकते हैं कि वैâसे इन लोगों ने हिंदुत्व की क्षमता को नया अर्थ और उस अर्थ को नया विस्तार दिया है। भले उस चक्कर में अर्थ का अनर्थ हो गया हो।
