शीतल अवस्थी
नारद जी कहते हैं, ‘सम्पाति की बात सुनकर हनुमान और अंगद आदि वानरों ने समुद्र की ओर देखा। फिर वे कहने लगे, ‘कौन समुद्र को लांघकर समस्त वानरों को जीवन-दान देगा?’ वानरों की जीवन-रक्षा और श्री रामचंद्रजी के कार्य की प्रकृष्ट सिद्धि के लिए पवनकुमार हनुमानजी सौ योजन विस्तृत समुद्र को लांघ गए। लांघते समय अवलम्बन देने के लिए समुद्र से मैनाक पर्वत उठा। हनुमानजी ने दृष्टिमात्र से उसका सत्कार किया। फिर (छायाग्राहिणी) सिंहिका ने सिर उठाया। (वह उन्हें अपना ग्रास बनाना चाहती थी, इसलिए) हनुमानजी ने उसे मार गिराया।
समुद्र के पार जाकर उन्होंने लंकापुरी देखी। राक्षसों के घरों में खोज की; रावण के अन्त:पुर में तथा कुम्भ, कुम्भकर्ण, विभीषण, इंद्रजित तथा अन्य राक्षसों के गृहों में जा-जाकर तलाश की; मद्यपान के स्थानों आदि में भी चक्कर लगाया; किंतु कहीं भी सीता उनकी दृष्टि में नहीं पड़ीं। अब वे बड़ी चिंता में पड़े। अंत में जब अशोक वाटिका की ओर गए तो वहां शिंशपा-वृक्ष के नीचे सीताजी उन्हें बैठी दिखाई दीं। वहां राक्षसियां उनकी रखवाली कर रही थीं। हनुमानजी ने शिंशपा-वृक्ष पर चढ़कर देखा। रावण सीताजी से कह रहा था, ‘तू मेरी स्त्री हो जा’; किंतु वे स्पष्ट शब्दों में ‘ना’ कर रही थीं। वहां बैठी हुई राक्षसियां भी यही कहती थीं, ‘तू रावण की स्त्री हो जा।’ जब रावण चला गया तो हनुमानजी ने इस प्रकार कहना आरंभ किया, ‘अयोध्या में दशरथ नाम वाले एक राजा थे। उनके दो पुत्र राम और लक्ष्मण वनवास के लिए गए। वे दोनों भाई श्रेष्ठ पुरुष हैं। उनमें श्री रामचंद्रजी की पत्नी जनक कुमारी सीता तुम्हीं हो। रावण तुम्हें बलपूर्वक हर ले आया है। श्री रामचंद्रजी इस समय वानर राज सुग्रीव के मित्र हो गए हैं। उन्होंने तुम्हारी खोज करने के लिए ही मुझे भेजा है। पहचान के लिए गूढ़ संदेश के साथ श्री रामचंद्रजी ने अंगूठी दी है। उनकी दी हुई यह अंगूठी ले लो’।
सीताजी ने अंगूठी ले ली। उन्होंने वृक्ष पर बैठे हुए हनुमानजी को देखा। फिर हनुमानजी वृक्ष से उतर कर उनके सामने आ बैठे, तब सीता ने उनसे कहा, ‘यदि श्री रघुनाथजी जीवित हैं तो वे मुझे यहां से ले क्यों नहीं जाते?’ इस प्रकार शंका करती हुई सीताजी से हनुमानजी ने इस प्रकार कहा, ‘देवि सीते! तुम यहां हो, यह बात श्री रामचंद्रजी नहीं जानते। मुझसे यह समाचार जान लेने के पश्चात सेना सहित राक्षस रावण को मार कर वे तुम्हें अवश्य ले जाएंगे। तुम चिंता न करो। मुझे कोई अपनी पहचान दो।’ तब सीताजी ने हनुमानजी को अपनी चूड़ामणि उतार कर दे दी और कहा, ‘भैया! अब ऐसा उपाय करो, जिससे श्री रघुनाथजी शीघ्र आकर मुझे यहां से ले चलें। उन्हें कौए की आंख नष्ट कर देने वाली घटना का स्मरण दिलाना; (आज यहीं रहो) कल सबेरे चले जाना; तुम मेरा शोक दूर करने वाले हो। तुम्हारे आने से मेरा दु:ख बहुत कम हो गया है।’ चूड़ामणि और काकवाली कथा को पहचान के रूप में लेकर हनुमानजी ने कहा, ‘कल्याणि! तुम्हारे पतिदेव अब तुम्हें शीघ्र ही ले जाएंगे। अथवा यदि तुम्हें चलने की जल्दी हो, तो मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मैं आज ही तुम्हें श्रीराम और सुग्रीव के दर्शन कराउंगा।’ सीता बोलीं, ‘नहीं, श्री रघुनाथजी ही आकर मुझे ले जाएं।
तदनंतर हनुमानजी ने रावण से मिलने की युक्ति सोच निकाली। उन्होंने रक्षकों को मार कर उस वाटिका को उजाड़ डाला। फिर दांत और नख आदि आयुधों से वहां आए हुए रावण के समस्त सेवकों को मारकर सात मंत्रि कुमारों तथा रावण पुत्र अक्षय कुमार को भी यमलोक पहुंचा दिया। तत्पश्चात इंद्रजीत ने आकर उन्हें नागपाश से बांध लिया और उन वानर वीर को रावण के पास ले जाकर उससे मिलाया। उस समय रावण ने पूछा, ‘तू कौन है?’ तब हनुमानजी ने रावण को उत्तर दिया, ‘मैं श्री रामचंद्रजी का दूत हूं। तुम श्री सीताजी को श्री रघुनाथजी की सेवा में लौटा दो; अन्यथा लंका निवासी समस्त राक्षसों के साथ तुम्हें श्रीराम के बाणों से घायल होकर निश्चय ही मरना पड़ेगा।’ यह सुनकर रावण हनुमानजी को मारने के लिए उद्यत हो गया; किंतु विभीषण ने उसे रोक दिया। तब रावण ने उनकी पूंछ में आग लगा दी। पूंछ जल उठी। यह देख पवन पुत्र हनुमानजी ने राक्षसों की पूरी लंका को जला डाला और सीताजी का पुन: दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया।
