मनमोहन सिंह
गजब! मान गए सरकार की ‘रीसाइक्लिंग’ कला को। पर्यावरण वाले तो बस प्लास्टिक रीसायकल करते रह गए, असली उस्ताद तो हमारी मिनिस्ट्री निकली, जिसने १२ साल पुराने नियमों को ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता, २०२०’ के नए रैपर में ऐसे लपेटा है कि नया दूल्हा भी शर्मा जाए। इसे कहते हैं ‘पुरानी शराब, एकदम कड़क नई बोतल।’
उम्मीदों का पोपट!
ईपीएफओ के आठ करोड़ सबस्क्राइबर्स बेचारे टकटकी लगाए बैठे थे कि इस बार तो लॉटरी लगेगी। उम्मीद थी कि १२ साल से जो १५,००० की वेतन सीमा और १,००० की ‘शाही’ न्यूनतम पेंशन आईसीयू में वेंटिलेटर पर है, उसे कोई बूस्टर डोज मिलेगा। लेकिन सरकार ने साफ कह दिया, ‘नो चेंज! जो मजा पुरानी यादों में है, वो नए बदलावों में कहां?’ सोचिए, आज के दौर में १,००० महीना! इतने में तो आदमी ढंग से बीमार भी नहीं हो सकता, पेंशन का लुत्फ उठाना तो दूर की बात है। रिपोर्ट कहती है कि करीब ३७ लाख बुजुर्ग इस ‘अति-आधुनिक’ पेंशन से अपनी अमीरी संभाल रहे हैं।
महामारी का बहाना और सरकारी खजाना
१५,००० से ऊपर स्वैच्छिक योगदान का नियम ऐसा पेश किया गया, जैसे कोई मंगल ग्रह की तकनीक हो, जबकि यह कोविड से पहले तक आम बात थी। कोविड क्या आया, कंपनियों को बहाना मिल गया और उन्होंने हाथ खींच लिए। सरकार का तर्क है कि पेंशन बढ़ाई तो ‘वित्तीय बोझ’ आ जाएगा। अरे हुजूर, जो १,००० करोड़ का ग्रांट-इन-एड आप दे रहे हैं, उससे ज्यादा तो लोग आजकल वीकेंड पर चाय-समोसे में उड़ा देते हैं! ११,००० करोड़ के बजट का बड़ा हिस्सा तो १.१६ प्रतिशत की उसी पुरानी सीमा की भेंट चढ़ जाता है।
तो क्या करे सरकार?
अगर ईपीएफओ को लग रहा है कि करोड़ों कर्मचारियों का हिसाब रखते-रखते उसके सिर में दर्द हो रहा है, तो काम पीएफआरडीए को सौंपकर खुद आराम से चादर तानकर सो जाए। जब तक दावों के निपटारे के लिए चक्कर काटने पड़ेंगे, तब तक सुधार सिर्फ फाइलों में मुस्कुराएगा। आखिर करोड़ों कर्मचारियों का दिल तोड़ना भी तो एक कला है और हमारी सरकार इसमें पूरी तरह ‘आत्मनिर्भर’ है!
