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संवेदनशीलता खो रहा समाज!

रमन मिश्र

लोग केवल नैतिक उपदेशों से नहीं, बल्कि राजनीति समाज परिवार और सोशल मीडिया देखकर भी सीखते हैं। यदि सार्वजनिक जीवन में आक्रामक भाषा, अपमान, गाली गलौज या हिंसक व्यवहार, भ्रष्ट आचरण का चलन बढ़ जाए और उसे सामाजिक राजनीतिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर व्यापक स्वीकृति मिलने लगे तो समाज इसे एक सामान्य व्यवहार का दर्जा देने लगता है। आज हमारे देश में यही हो रहा है।
केतन अग्रवाल की हत्या एक कथित षड्यंत्र के तहत की गई हत्या का मामला है और इसकी जांच जारी है। केतन अग्रवाल की सगाई, कथित प्रेम संबंध, हत्या की साजिश, कई असफल प्रयास, लोहगड ट्रेक, खाई में गिरने को पहले दुर्घटना माना गया। बाद में कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर हत्या का मामला दर्ज हुआ। अंतिम पैâसला अदालत करेगी। एक दंत चिकित्सक एक इंस्टाग्राम पोस्ट के माध्यम से केतन अग्रवाल के गंजेपन का मजाक उड़ाते हुए कहती है, ‘ऐसे झूठ बोलोगे तो मरोगे ही’। यह कितनी घोर असंवेदनशील और क्रूर टिप्पणी है? किसी हत्या का मजाक हास्य नहीं, संवेदनहीनता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ मानवीय संवेदना और पेशेवर जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है। यदि किसी रिश्ते से बाहर निकलने के बजाय छल, षड्यंत्र और हिंसा का रास्ता चुना जाता है, तो यह सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण के क्षरण का संकेत है।
जब शासन और समाज दोनों हिंसा के प्रति संवेदनशीलता खोने लगते हैं, तब हिंसा केवल अपराध नहीं रह जाती, वह सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनने लगती है। आज यही हमारे देश में हो रहा है। यदि कानून का निष्पक्ष और प्रभावी अनुपालन कमजोर पड़ जाए, सांप्रदायिक या जातीय वैमनस्य को खुले आम बढ़ावा दिया जा रहा हो , महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर त्वरित कार्यवाही न हो रही हो, या भीड़ खुलेआम कानून अपने हाथ में लेने लगे, तो समाज में यह संदेश पैâल सकता है कि नियमों का उल्लंघन करने की कीमत बहुत कम है।
लोग बार-बार जो देखते हैं, वही धीरे-धीरे सामान्य मानने लगते हैं। यदि हिंसक या घृणात्मक व्यवहार को पर्याप्त सामाजिक या कानूनी प्रतिरोध नहीं मिलता, तो कुछ लोग उसे स्वीकार्य या प्रभावी माध्यम समझने लगते हैं। जब न्याय निष्पक्ष, त्वरित और दृश्यमान होता है, तब समाज में संयम, विश्वास और सह-अस्तित्व मजबूत होते हैं। लेकिन जब दण्ड का भय और न्याय पर भरोसा दोनों कमजोर पड़ते हैं, तो आक्रामकता, अविश्वास और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ने का जोखिम भी बढ़ जाता है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज की स्थिरता के लिए आवश्यक है कि कानून का शासन निष्पक्ष हो, संस्थाएं निर्भीक हों, और हिंसा, चाहे वह किसी भी विचार, धर्म, जाति, समूह या व्यक्ति के नाम पर हो,उसे समान दृढ़ता से रोका जाए। यही सामाजिक शांति और लोकतांत्रिक संस्कृति की सबसे मजबूत नींव है।
केतन अग्रवाल हत्याकांड जैसे मामले सवाल उठाते हैं, क्या हम संवाद की जगह हिंसा और संवेदना की जगह क्रूरता को सामान्य मानने लगे हैं? क्या हमारा समाज हिंसा, क्रूरता और झूठ के मार्ग पर तेजी से नहीं बढ़ रहा है? समाजशास्त्रियों का कहना है कि जब लोगों को लगता है कि न्याय धीमा है या नियम समान रूप से लागू नहीं हो रहे हैं, तो सामाजिक विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। धर्म, जाति, विचारधारा या राजनीतिक पहचान अब संवाद के बजाय टकराव का कारण बन गए हैं। हम धीरे धीरे रिश्तों में संवाद और असहमति के प्रति सम्मान खोते चले जा रहे हैं। ट्रोलिंग और सनसनी जैसी प्रवृत्तियां समाज की सामूहिक संवेदनशीलता के लिए चुनौती हैं। परिवारों में संवाद की संस्कृति और जिम्मेदार सार्वजनिक विमर्श का चलन धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज की परिपक्वता की पहचान यह है कि सबसे कठिन मतभेदों का समाधान हिंसा के बजाय कानून, संवाद और मानवीय गरिमा के माध्यम से कर सके। यही वह दिशा है जो समाज को अधिक सुरक्षित, संवेदनशील और स्थिर बनाती है।

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