मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : जनता की जेब पर पहरा सत्ता के सपनों का सवेरा

तीर-ए-तौसीफ : जनता की जेब पर पहरा सत्ता के सपनों का सवेरा

तौसीफ कुरैशी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव नहीं, बल्कि जनता की निरंतर सहमति होती है। चुनाव पांच साल में एक बार होते हैं, लेकिन लोकतंत्र हर दिन सांस लेता है। जब सरकारें जनता की राय सुनना छोड़ देती हैं और पैâसले केवल सत्ता के गलियारों में तय होने लगते हैं, तब लोकतंत्र का शरीर तो बचा रहता है, उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है। आज सवाल केवल यह नहीं है कि किसी सर्वे में ५३ प्रतिशत लोग किसी नीति का विरोध कर रहे हैं या समर्थन। ५३ प्रतिशत क्या १०० प्रतिशत पर भी कुछ नहीं होता? क्योंकि भारत विशाल लोकतांत्रिक मुल्क है, जहां न इस्तीफे होते हैं और न जनविरोध का ख्याल रखा जाता है। वर्तमान की चिंता कतई न करें, भगवान भरोसे छोड़ दें। जोर से बोलें गड़करी महाराज की जय। पेट्रोल में गन्ने का जूस मिलाकर बेचने का भारी विरोध हो रहा है, लेकिन सरकार सीना ताने खड़ी है। क्योंकि उसे जनता-जनार्दन से डर नही लगता है, क्योंकि जनता-जनार्दन ने उसका चयन मुद्दों पर आधारित किया ही नही है इसलिए वह जानती है कि जैसे ही हम कब्रिस्तान, श्मशान, मंगलसूत्र, भैंस खोल कर ले जाएंगे, कपड़ों से पहचान आदि अहमकता से भरपूर लच्छेदार भाषण करेंगे। सब खत्म हो जाएगा और सही भी है, यही हो भी रहा है। सवाल यह है कि अगर असंतोष बढ़ रहा है तो क्या सत्ता उसे सुनने को तैयार है? नही। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में विवादास्पद नीतियों पर जनमत संग्रह, संसदीय बहस और व्यापक सार्वजनिक विमर्श की परंपरा है। भारत में भी संसद और सार्वजनिक संवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, लेकिन यह भी सच है कि कई बार विपक्ष और नागरिक समाज आरोप लगाते हैं कि महत्वपूर्ण निर्णयों पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। पिछले कुछ वर्षों में देश में ‘विकास’ सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला राजनीतिक शब्द बन गया है, जबकि यह सच नही है। सही मायने में अगर किसी का विकास हुआ है तो वह गौतम अडानी हैं, कहां से कहां पहुंचा दिया है। किसी से छिपा नही है इसीलिए यह सरकार जनता की नही, हम दो हमारे दो की जानी जाती है अडानी वैâसे फूलें ऐसी नीतियां बनाई जाती हैं। इसीलिए आम आदमी पूछ रहा है कि विकास आखिर किसका हुआ? अगर महंगाई लगातार घरेलू बजट पर दबाव डाल रही हो, रोजगार चिंता का विषय बना रहे, छोटे व्यापारी कर व्यवस्था और बढ़ती लागत से परेशान हों और मध्यम वर्ग पर तरह-तरह के शुल्कों का बोझ बढ़ता महसूस हो तो विकास का दावा लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से मेल नहीं खाता। सरकार की आलोचना करने वाले कहते हैं कि राजस्व जुटाने के नए-नए तरीके खोजे जा रहे हैं, जबकि आम नागरिक की आय उसी गति से नहीं बढ़ रही। दूसरी ओर सरकार का पक्ष है कि करों और शुल्कों से प्राप्त धन का उपयोग बुनियादी ढांचे, कल्याणकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं में किया जा रहा है। लोकतंत्र में इन दोनों दावों की जांच तथ्यों और सार्वजनिक विमर्श के आधार पर होनी चाहिए। धार्मिक आस्था भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गई है। मंदिरों, ट्रस्टों और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े वित्तीय मामलों पर समय-समय पर विवाद और आरोप सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग स्वाभाविक है। लेकिन किसी भी विशेष संस्था या घटना पर निष्कर्ष निकालने से पहले प्रमाण और आधिकारिक तथ्यों का इंतजार करना भी उतना ही आवश्यक है। आज जनता का बड़ा वर्ग यह महसूस करता है कि उसकी समस्याओं महंगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि पर अपेक्षित गंभीरता से चर्चा कम होती है, जबकि राजनीतिक विमर्श अक्सर भावनात्मक मुद्दों पर केंद्रित रहता है। लोकतंत्र का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि नागरिकों का विश्वास बनाए रखना भी है। संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं, बल्कि असहमति को सम्मान देने का मंच भी है। यदि विपक्ष लगातार यह कह रहा है कि उसे पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह संवाद को और मजबूत बनाए। उसी प्रकार विपक्ष की जिम्मेदारी भी है कि वह रचनात्मक सुझाव दे और तथ्यों पर आधारित आलोचना करे। लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा विरोध नहीं, बल्कि विरोध को अनसुना करना होता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, संस्थाओं की विश्वसनीयता बनी रहनी चाहिए, लेकिन आज सभी संस्थाए अपना विश्वास खो चुकी हैं। जब जनता यह महसूस करने लगे कि उसकी आवाज केवल चुनाव तक सीमित है, तब लोकतंत्र का संतुलन कमजोर पड़ता है। २०४७ तक विकसित भारत का सपना निश्चित रूप से प्रेरक हो सकता है, लेकिन किसी भी विकसित राष्ट्र की पहचान केवल ऊंची इमारतों, एक्सप्रेसवे और बड़े निवेश से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से भी होती है कि वहां का नागरिक कितना सुरक्षित, सम्मानित और सुना हुआ महसूस करता है। विकास का अर्थ तभी सार्थक होगा, जब आम आदमी की जेब मजबूत हो, युवाओं को रोजगार मिले, किसानों को उचित आय मिले और नीतियों पर खुला संवाद हो। लोकतंत्र में जनता मालिवâ होती है और सरकार सेवक। यदि मालिक बार-बार अपनी तकलीफ बता रहा हो तो सेवक का पहला कर्तव्य सुनना होता है, समझाना नहीं। सरकार की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि वह आलोचना को दबा दे, बल्कि यह कि वह आलोचना का जवाब नीति, पारदर्शिता और परिणाम से दे। आखिरकार, लोकतंत्र किसी एक दल, एक नेता या एक विचारधारा का नहीं होता। वह जनता का होता है। और जब जनता की आवाज कमजोर पड़ने लगे, तब सबसे पहले लोकतंत्र की घंटी बजती है। उस घंटी को सुनना ही किसी भी जिम्मेदार सरकार की असली परीक्षा है।
सत्यमेव जयते

अन्य समाचार