तेरह बरस की मासूम आंखों में,
सपनों का नया उजियारा था।
दरिंदों की इस अंधी दुनिया ने,
हरेक उस विश्वास को मारा था।
बेटी नहीं, यहीं मानो इंसानियत,
बाजारों में क्यों? बिक जाती है।
यूं सत्ता, समाज और संवेदनाएं,
चुप रहकर नींद लें सो जाती हैं।
न जाने कहां चले गए ऊंचे नारे,
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ…?
आज बेटी ही सुरक्षित न हो गर,
तो किस पे गर्व जताएंगे रहबर?
यहां हर अपराधी को दण्ड मिले,
ऐसा कोई कठोर विधान भी बने।
कोई मासूम अस्मत पर यूं न रोए,
हमारा हिंदुस्थान ऐसा महान बने।
आओ हम मिलकर शपथ उठाएं,
देश की हर नारी का सम्मान करें।
इन बेटियों की मुस्कान बचाने को,
अब हर अन्याय का प्रतिकार करें।
-संजय एम तराणेकर
इंदौर, मध्य प्रदेश
