तौसीफ कुरैशी
लोकतंत्र में किसी नेता की सबसे बड़ी ताकत कैमरे के सामने खड़ी भीड़ नहीं होती बल्कि जनता का वह विश्वास होता है, जो बिना बसों, चार्टर्ड विमानों और सरकारी तामझाम के अपने आप उमड़ पड़े। भीड़ जुटाई जा सकती है, तालियां बजवाई जा सकती हैं, मंच सजाए जा सकते हैं, लेकिन सम्मान खरीदा नहीं जा सकता। सम्मान अर्जित करना पड़ता है। हाल के दिनों में ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी कार्यक्रमों और उनकी सार्वजनिक छवि को लेकर कई सवाल उठे। कुछ पत्रकारों ने यह भी आरोप लगाया कि कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीयों को विशेष व्यवस्था के माध्यम से लाया गया। सही भी है और इस पूरी कवायद पर भारी सरकारी खर्च भी किया गया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतना अवश्य है कि जब किसी लोकतांत्रिक देश का मीडिया ऐसे सवाल उठाता है, तो उन्हें केवल राष्ट्रवाद का आवरण ओढ़ाकर खारिज नहीं किया जा सकता। एक और सवाल बार-बार उठता है कि भारत का प्रधानमंत्री नियमित प्रेस कॉन्प्रâेंस क्यों नहीं करता। लोकतंत्र में पत्रकारों के सवालों से बचना ताकत का नहीं, बल्कि असहजता का संकेत माना जाता है।
जनता अपने नेता को केवल भाषण देते हुए नहीं, बल्कि कठिन सवालों का सामना करते हुए भी देखना चाहती है। जवाबदेही लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी सियासी विंग भाजपा बचती है दुनिया आज प्रचार से अधिक पारदर्शिता को महत्व देती है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर किसी भी देश की प्रतिष्ठा केवल भव्य आयोजनों या विशाल भीड़ से नहीं बनती। वह बनती है संस्थाओं की विश्वसनीयता, लोकतांत्रिक परंपराओं, प्रेस की स्वतंत्रता और सरकार की जवाबदेही से। यदि किसी नेता की छवि को लेकर बार-बार सवाल उठ रहे हों, तो उन सवालों का उत्तर तथ्यों और संवाद से दिया जाना चाहिए, न कि केवल प्रचार से। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी सभ्यता, उसका लोकतंत्र और उसकी जनता है। किसी एक व्यक्ति की छवि भारत नहीं है। भारत उससे कहीं बड़ा है, लेकिन संघी अपने आपको ही बड़ा बनाते है।
अंधभक्ति नहीं, सवाल ही लोकतंत्र की पहचान हैं
इतिहास गवाह है कि सत्ता का सबसे बड़ा भ्रम यह होता है कि वैâमरे में दिखाई देने वाली भीड़ ही जनता है। लेकिन जनता कैमरे के फ्रेम से कहीं बड़ी होती है। वह समय आने पर अपना फैसला स्वयं सुनाती है। लोकतंत्र में सबसे ऊंचा सिंहासन भी जनता के फैसले से बड़ा नहीं होता। भारत को किसी झटके की नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों की आवश्यकता है। ऐसे नागरिक जो किसी भी सरकार से सवाल पूछने का साहस रखें और किसी भी नेता की अंधभक्ति के बजाय संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भरोसा करें। क्योंकि जब जनता सवाल पूछना सीख जाती है, तभी लोकतंत्र वास्तव में मजबूत होता है और वही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी आजादी होती है।
इसलिए `हम दो हमारे दो’ की सरकार पर या प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार, पक्षपात या उद्योगपतियों के निकट होने जैसे आरोप लगते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच और पारदर्शी जवाब लोकतंत्र को मजबूत करते हैं। आरोपों को दबाने से विश्वास नहीं बनता अडानी के लिए विदेश यात्राएं की जाती हैं।
ढोल में दरार, नारों में दरकता भरोसा
लोकतंत्र में सत्ता का सबसे बड़ा सहारा केवल बहुमत नहीं होता, बल्कि जनता का भरोसा होता है। जब भरोसे में दरार पड़ती है तो सबसे मजबूत दिखने वाली दीवार भी भीतर से खोखली होने लगती है। राजनीति का इतिहास बताता है कि किसी भी दल की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि जनता के मन में उठता संदेह होता है।
भारतीय जनता पार्टी इन दिनों ऐसे ही दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। एक ओर अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े वित्तीय लेन-देन, चढ़ावे और चंदे को लेकर लगाए जा रहे आरोप चर्चा में हैं। इन आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्णय ईमानदारी से जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा इनके रहते यह संभव नहीं लग रहा है, क्योंकि जांच के नाम पर लीपापोती हो रही है अगर सरकार वास्तव ईमानदार है तो इसकी जांच आईपीएस जसबीर सिंह को सौंप दी जाए, फिर देखना दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। मगर सरकार ऐसा नहीं करेगी, पर हां यह भी उतना ही सच है कि जब आस्था से जुड़े संस्थानों पर सवाल उठते हैं तो उसका असर केवल राजनीति पर नहीं, बल्कि जनविश्वास पर भी पड़ता है। राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बंसल या अनिल मिश्रा की इस्तीफे के रूप में बलि या किसी पदाधिकारी का इस्तीफा हर बार जनता के मन में उठे अविश्वास को समाप्त नहीं कर देता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा के दामन पर लगा यह दाग साफ नहीं हो पा रहा है। दूसरी ओर मध्य प्रदेश के दतिया में टिकट वितरण के बाद सामने आए विरोध ने भाजपा के भीतर की बेचैनी को उजागर किया। विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी और संगठन के भीतर असंतोष ने यह संकेत दिया कि हर राजनीतिक दल के भीतर स्थानीय नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता। यदि कार्यकर्ताओं का असंतोष सार्वजनिक रूप से फूटने लगे तो यह केवल एक जिले का मामला नहीं रह जाता, बल्कि संगठनात्मक चुनौती बन जाता है।
इसी बीच न्यायपालिका और प्रशासन से जुड़े कुछ घटनाक्रम भी चर्चा का विषय बने हैं। अदालतों में असामान्य व्यवहार, अधिकारियों को सार्वजनिक धमकियां और राजनीतिक भाषा में बढ़ती कटुता लोकतांत्रिक मर्यादाओं के लिए चिंता का विषय हैं। यह किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र का प्रश्न है।
ाोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन संस्थाओं के सम्मान की भी उतनी ही आवश्यकता है। २०११-१२ के दौर में भ्रष्टाचार और जनाक्रोश की जो हवा गोदी मीडिया के द्वारा बनवाई गई थी, उसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी थी। आज परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन यह भी सच है कि जनता हर दौर में अपने अनुभवों के आधार पर राय बनाती है। मीडिया का रुख चाहे जो हो, अंतिम पैâसला मतदाता ही करता है। राजनीति में ढोल जितना जोर से बजता है, उसकी दरार भी उतनी ही दूर तक सुनाई देती है। यदि जनता के मन में सवाल बढ़ने लगें तो केवल नारों, अभियानों या छवि-प्रबंधन से उन्हें हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। लोकतंत्र में सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की निरंतर रक्षा है। और जब भरोसा डगमगाने लगे, तभी सबसे बड़ी राजनीतिक घंटी बजती है जिसे सुनने वाले बच जाते हैं और अनसुना करने वाले इतिहास बन जाते हैं।
