`जंतर-मंतर’ का युद्ध फिलहाल खत्म हो गया है। `कॉकरोच जनता पार्टी के तरुण तुर्कों ने जश्न मनाया’, `श्रमपरिहार किया’ जैसी खबरें, तस्वीरें बीजेपी आईटी सेल की तरफ से प्रसारित की जा रही हैं। मानो इन बच्चों ने कोई बड़ा अपराध ही कर दिया हो और इस अपराध की कोई माफी नहीं है, ऐसा बीजेपी के बचे-खुचे अंधभक्तों द्वारा कहा गया। मूल रूप से `जंतर-मंतर’ का आंदोलन कोई `रोना-धोना’ आंदोलन नहीं था, बल्कि युवाओं का एक जबरदस्त उत्सव था। पुलिस की लाठियां, पेलेट गन्स, कीलों वाली लाठियां, आंसू गैस के गोले सहकर भी युवाओं के चेहरों पर दर्द की शिकन तक नहीं थी। इसलिए आंदोलन खत्म होने पर कॉकरोच किसी बैठक में बैठकर सोच-विचार कर रहे हों, तो बीजेपी के बिच्छुओं के डंक दुखने की कोई वजह नहीं है। इस सारे आनंद-उत्सव में जो खो गए हैं, वे हैं मुहम्मद जुनैद और शदाब सैफी। `जंतर-मंतर’ के आंदोलन के वे प्रमुख हिस्सेदार थे और उसी के चलते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पुलिस ने जुनैद और उसके परिवार को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया है। आंदोलन के पहले दिन से ही जुनैद `जंतर-मंतर’ के सभी आंदोलनकारियों को खाना और पानी पहुंचा रहा था। उसके पैरों में जख्म हो गए थे, फिर भी कोई आंदोलनकारी भूखा न रहे इसलिए वह दौड़-भाग कर रहा था। इधर-उधर से `जुगाड़’ करके `जंतर-मंतर’ पर खाने-पीने की पुख्ता व्यवस्था कर रहा था। आंदोलनकारियों को `रसद’ न मिल सके, इसलिए पुलिस ने कनॉट प्लेस इलाके के सभी होटल और सड़क किनारे के फूड स्टॉल्स बंद करवा दिए। `स्वीगी’ जैसी व्यवस्थाएं बंद करके `जंतर मंतर’ पर
भुखमरी की नौबत आए, इसका इंतजाम
किया; लेकिन इतना सब करने के बाद भी जुनैद और सैफी की भोजन व्यवस्था जारी ही रही और `जंतर-मंतर’ का आंदोलन खत्म होने तक जुनैद यह सेवा देता रहा। `जंतर-मंतर’ पर इकट्ठा हुआ हर कार्यकर्ता और छात्र जुनैद का शुक्रिया अदा कर रहा था। जाहिर है, जुनैद ने यह सब सिर्फ इंसानियत के नाते किया। देश के कोने-कोने से आए ये बच्चे, कोई २० रुपए लेकर आया था, तो कोई नंगे पैर और भूखा ही निकल पड़ा था। उन्हें खाना खिलाने वाला जुनैद सरकार का अपराधी बन गया। जुनैद का, उसके बाल-बच्चों का, माता-पिता, बहन और उसके ससुर का उत्पीड़न पुलिस ने शुरू कर दिया है। जुनैद और उसके परिजनों को अचानक उठाकर पुलिस स्टेशन ले जाया जा रहा है। १२-१२ घंटे बिठाकर रखा जा रहा है। जुनैद से तो आंदोलनकारियों को दिए गए हर एक `दाने’ का हिसाब मांगा जा रहा है। जुनैद एक साधारण इंसान है, फिर भी ३५ दिनों तक उसने हजारों लोगों को खाना खिलाया। यह खर्च किसने किया? इसकी जांच पुलिस कर रही है। जुनैद को `फंडिंग’ किसने की? यह भारत सरकार के खोज अभियान का मुख्य हिस्सा बना हुआ है। पहलगाम में आतंकवादी घुसे और उन्होंने २७ पर्यटकों को मार डाला, उन आतंकवादियों को सरकार ढूंढ नहीं पाई। पुलवामा में ४० जवानों की `बस’ आरडीएक्स धमाके में उड़ा दी गई, उस आरडीएक्स के आका को भी सरकार ढूंढ नहीं सकी; लेकिन जुनैद का मददगार कौन है, यह ढूंढने के लिए अमित शाह और मोदी जैसे लोगों ने पूरी
केंद्र सरकार को काम पर
लगा दिया है। जुनैद से `जंतर-मंतर’ के खाने-पीने का हिसाब मांगा जा रहा है, क्योंकि उसके सिर पर टोपी और चेहरे पर दाढ़ी थी। इस सरकार को इंसानियत और देशभक्ति वगैरह से कोई लेना-देना नहीं है। इसीलिए जुनैद ने इतना खर्च कैसे किया? यह सवाल उन्हें सता रहा है और इसके जवाब के लिए उसे और उसके परिवार को परेशान किया जा रहा है। वास्तव में, ऐसी जांच-पड़ताल की जरूरत `पीएम केयर्स फंड’ नाम के महाघोटाले में है। पीएम केयर्स फंड कोरोना काल में बनाया गया था। सरकारी `फंड’ होने का दिखावा करके उसमें हजारों करोड़ जमा किए गए। उस `कोश’ में आखिर किसने कितने पैसे डाले और क्यों? उस पूरे पैसे का वास्तविक मालिकाना हक किसके पास है? यह भी तो देश को पता चलना चाहिए। बीजेपी के फंड और चुनावी चंदे के खाते में हजारों करोड़ जमा हुए, वे किन रास्तों से आए? उसकी भी जांच होने दीजिए। जुनैद और सैफी ने `जंतर-मंतर’ पर भूखे लड़के-लड़कियों को खाना दिया, यही उनका अपराध बन गया है। क्योंकि `जंतर-मंतर’ की लड़ाई देश में तानाशाही के खिलाफ थी। नारे लगाने वाले भूखे थे; वे भूख से ही मर जाएं, बीजेपी को ऐसा लगना स्वाभाविक था। लेकिन जुनैद-सैफी जैसे लोगों ने `जंतर-मंतर’ पर भुखमरी नहीं होने दी। वहां के गुरुद्वारों के लंगर इन बच्चों के लिए दिन-रात चालू थे। यही सच्चा धर्म है। जुनैद-सैफी को अगर इसके लिए प्रताड़ित किया जा रहा है, तो सोनम वांगचुक, अभिजीत दीपके और सभी मानवतावादियों को एक बार फिर युद्ध का बिगुल फूंकना चाहिए! जुनैद के `जंतर-मंतर’ के संघर्ष में दिए गए योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
