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छात्रों पर फिर एफआईआर और चेहरों की डिजिटल पहचान…मोदी पर भड़का देश का युवा?

-सीजेपी का आरोप- आंदोलन खत्म कराते समय कार्रवाई न करने का भरोसा दिया, अब एफआईआर, हिरासत और मुकदमों की आड़ में प्रदर्शनकारियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर ३६ दिनों तक जंतर-मंतर पर डटे युवाओं का आंदोलन भले ही सरकार से समझौते के बाद समाप्त हो गया हो, लेकिन सड़कों पर पैदा हुआ आक्रोश अभी शांत नहीं हुआ है। प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने के बजाय बिहार, बंगाल, दिल्ली और कुछ अन्य राज्यों से गिरफ्तारी, हिरासत, पूछताछ तथा पुलिस निगरानी की खबरें सामने आने के बाद सीजेपी ने सरकार पर समझौते का खुला उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। सीजेपी का कहना है कि आंदोलन समाप्त कराते समय सरकार ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने, मुकदमे वापस लेने और किसी तरह की प्रताड़ना रोकने का भरोसा दिया था।
वादा मुकदमे वापस लेने का, जमीन पर नई गिरफ्तारियां
२५ जुलाई को सरकार और सीजेपी की संयुक्त प्रेस कॉन्प्रâेंस में प्रदर्शन समाप्त करने की घोषणा हुई थी। समझ के प्रमुख बिंदुओं में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने की दिशा में कार्रवाई, मृत छात्रों के परिवारों को नियमों के अनुसार मुआवजा और परीक्षा सुधार से जुड़े पांच सूत्रीय चार्टर पर विचार शामिल था। लेकिन सीजेपी का आरोप है कि समझौते की स्याही सूखने से पहले ही कई राज्यों में पुलिस कार्रवाई शुरू हो गई।
आंदोलन से जुड़े लोगों को किया जा रहा है परेशान!
बिहार में जुलाई के प्रदर्शनों के बाद ८६ लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने और कई एफआईआर दर्ज होने की जानकारी सामने आई। करीब ६० अन्य लोगों, जिनमें महिलाएं और नाबालिग भी बताए गए, को निजी मुचलके पर छोड़ा गया। सीजेपी ने बंगाल, असम और दिल्ली में भी छात्रों तथा आंदोलन से जुड़े स्वयंसेवकों को हिरासत में लेने और परेशान करने के आरोप लगाए हैं। हालांकि अलग-अलग घटनाओं में पुलिस ने हिंसा, तोड़फोड़ और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के आरोपों का हवाला दिया है। सबसे बड़ा विवाद जंतर-मंतर पर तैनात फेस रिकॉग्निशन सिस्टम यानी एफआरएस वैन को लेकर है।
दिल्ली पुलिस की निगरानी वैन में एआई आधारित कैमरे, ३६० डिग्री निगरानी और चेहरे को डेटाबेस से मिलाने की व्यवस्था थी। पुलिस का कहना है कि इस तकनीक का उद्देश्य आपराधिक पृष्ठभूमि वाले या वांछित व्यक्तियों को प्रदर्शन में प्रवेश करने से रोकना था। लेकिन युवाओं का सवाल है कि यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था तो हजारों नागरिकों के चेहरे स्वैâन करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? प्रदर्शन स्थल पर आने वाले कुछ लोगों से कथित रूप से उनके इंस्टाग्राम हैंडल भी नोट कराए गए।
ऐसे में आशंका है कि चेहरा, मोबाइल नंबर और सोशल मीडिया पहचान को जोड़कर आंदोलनकारियों का स्थायी डिजिटल प्रोफाइल बनाया जा रहा है। सीजेपी के अनुसार, यह केवल सुरक्षा व्यवस्था नहीं बल्कि भविष्य में आंदोलनकारियों को चुन-चुनकर निशाना बनाने की तैयारी हो सकती है। संगठन का तर्क है कि पुलिस रिकॉर्ड से चेहरा मेल खाने का अर्थ किसी व्यक्ति का दोषी होना नहीं है। किसी पुराने मुकदमे में नाम, पूछताछ, पूर्व गिरफ्तारी या बाद में बरी हो चुके व्यक्ति की तस्वीर भी पुलिस डेटाबेस में हो सकती है। इसलिए एफआरएस मिलान को सीधे ‘आपराधिक पृष्ठभूमि’ का प्रमाण बताना युवाओं को बदनाम करने का हथियार बन सकता है। सरकार का समझौता मौखिक था या लिखित? सीजेपी ने प्रेस कॉन्प्रâेंस में सरकार से यह भी पूछा कि पुलिस कार्रवाई नहीं करने और मुकदमे वापस लेने संबंधी लिखित समझौता अब तक उसे क्यों नहीं दिया गया। संगठन ने केंद्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह से लिखित दस्तावेज तथा मुकदमे वापस लेने की तय समयसीमा उपलब्ध कराने की मांग की है। यहीं सरकार की नीयत पर बड़ा सवाल खड़ा होता है।
यदि बातचीत में कोई स्पष्ट सहमति बनी थी तो उसे लिखित रूप में सार्वजनिक करने में परेशानी क्यों होनी चाहिए? और यदि सरकार ने केवल ‘विचार करने’ की बात कही थी तो आंदोलनकारियों के सामने मुकदमे खत्म करने का भरोसा किस आधार पर पेश किया गया?
कानूनी कार्रवाई में सबूत बचाने का काम करेगा। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने आंदोलनकारियों की कानूनी सहायता के लिए १ करोड़ के फंड की घोषणा भी की है। समझौता या आंदोलन शांत कराने की चाल? सरकार यदि अपने वादे के अनुसार मुकदमे वापस लेती है, गिरफ्तार छात्रों को रिहा कराती है और निगरानी में जुटाया गया अनावश्यक डेटा नष्ट करती है तो भरोसा बहाल हो सकता है। लेकिन यदि एक तरफ बातचीत और दूसरी तरफ मुकदमे, गिरफ्तारी तथा डिजिटल निगरानी चलती रही तो समझौता केवल आंदोलन को अस्थायी रूप से शांत कराने की रणनीति माना जाएगा। सीजेपी ने साफ चेतावनी दी है कि सरकार ने तत्काल कार्रवाई नहीं की तो प्रदर्शन दोबारा शुरू होगा। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह युवाओं को लोकतंत्र का भागीदार मानती है या निगरानी वैâमरे में वैâद किया जाने वाला संदिग्ध चेहरा।

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