सना खान
एक बुजुर्ग नाविक वर्षों से नदी के किनारे लोगों को एक घाट से दूसरे घाट तक पहुंचाने का काम करता था। उसका बेटा बचपन से उसे देखता आया था। एक दिन बेटे ने पूछा, ‘पिताजी, आपने कभी शहर जाकर कोई बड़ा काम करने के बारे में नहीं सोचा?’ बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, ‘सोचा था, लेकिन हर सफर मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं होता। कुछ सफर हमें यह सिखाने के लिए होते हैं कि कहां रुक जाना चाहिए।’ बेटे को उस समय उनकी बात समझ नहीं आई। वर्षों बाद उसने अपना कारोबार शुरू किया। मेहनत और लगन से उसका काम बढ़ने लगा। एक सफलता के बाद दूसरी सफलता मिलने लगी। लेकिन जितना उसका कारोबार बढ़ता गया, उतना ही उसका जीवन उलझता गया। अब वह पहले से ज्यादा कमाता था, लेकिन परिवार के साथ बैठने का समय नहीं था। दोस्तों से मुलाकातें बंद हो गई थीं। रात को देर से घर लौटता और सुबह जल्दी निकल जाता। उसे लगता था कि अगर वह थोड़ा और मेहनत कर ले, थोड़ा और आगे बढ़ जाए, तो शायद उसे सुकून मिल जाएगा। एक दिन लगातार काम करते-करते उसकी तबीयत बिगड़ गई। डॉक्टर ने आराम करने की सलाह दी।
कई वर्षों बाद वह कुछ दिनों के लिए अपने गांव लौटा। शाम को वह अपने पिता के साथ नदी किनारे बैठा था। उसने देखा कि उसके पिता ने अपनी नाव किनारे बांध दी थी, जबकि अभी कुछ यात्री और आने वाले थे।
उसने हैरानी से पूछा, ‘आज आप जल्दी क्यों रुक गए?’ बुजुर्ग ने नदी की ओर देखते हुए कहा, ‘बेटा, नदी का बहाव कभी नहीं रुकता, लेकिन नाविक अगर सही समय पर किनारे न लगे, तो एक दिन थककर डूब जाता है।’ यह सुनकर बेटा चुप हो गया। उसे एहसास हुआ कि वह वर्षों से सिर्फ दौड़ रहा था। उसने बहुत कुछ हासिल किया था, लेकिन उस दौड़ में अपने हिस्से का सुकून कहीं पीछे छोड़ आया था। सबसे मुश्किल काम सही समय पर रुक जाना होता है। क्योंकि जिंदगी हमेशा आगे बढ़ते रहने का नाम नहीं है। कई बार खुद को बचाने, अपनों के लिए समय निकालने और सुकून को संभालने के लिए रुकना भी उतना ही जरूरी होता है।
