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वायरल न्यूज : महज १० मिनट के लिए ३,२०० पेड़ों की बलि…विकास या विनाश?

ई राज

उत्तराखंड के ऋषिकेश-भानियावाला राष्ट्रीय राजमार्ग पर ‘सात मोड़’ के घने जंगलों में इन दिनों कुल्हाड़ियों और आधुनिक मशीनों की गूंज है। सरकार द्वारा इस २१ किलोमीटर लंबे हाईवे को फोर-लेन बनाने यानी उसका चौड़ीकरण करने के लिए करीब ३,२०० से अधिक हरे-भरे पेड़ों को काटने का पैâसला लिया गया है। हैरान करनेवाली बात यह है कि पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों के अनुसार, इस विशाल जंगल को साफ करने के बाद देहरादून और ऋषिकेश के बीच के सफर में महज १० से १५ मिनट की बचत होगी। यानी सिर्फ चंद मिनटों के सफर को आसान बनाने के लिए दशकों पुराने जंगल को उजाड़ा जा रहा है।
इस पैâसले के खिलाफ स्थानीय निवासियों और पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश है। लोग ऐतिहासिक ‘चिपको आंदोलन’ की तर्ज पर पेड़ों से चिपककर इस कटाई का विरोध कर रहे हैं। यह पूरा क्षेत्र शिवालिक रेंज का हिस्सा है, जो न केवल देहरादून की हवा को साफ रखता है, बल्कि जंगली हाथियों का एक प्रमुख ‘एलीफेंट कॉरिडोर’ (आवागमन मार्ग) भी है। इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों के कटने से हाथियों का इंसानी बस्तियों में दखल बढ़ेगा, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं तेज होने की आशंका है।
हाल ही में मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट भी पहुंचा था, जहां पर्यावरण कार्यकर्ताओं की याचिका पर कोर्ट ने सरकार से इसके विकल्पों जैसे एलिवेटेड रोड और पर्यावरणीय स्वीकृतियों पर जवाब मांगा था। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति को निरंतर दांव पर लगाया जा रहा है।
उत्तराखंड में पेड़ों की कटाई: कुछ महत्वपूर्ण डेटा और तथ्य
कीमती प्रजातियों का नुकसान: काटे जा रहे इन ३,२०० से अधिक पेड़ों में मुख्य रूप से साल, सागौन और कंजू जैसी बेहद कीमती और प्राचीन प्रजातियां शामिल हैं। अकेले इस पैच में करीब ७०० साल और ९०० से अधिक कंजू के पेड़ हैं, जिन्हें दोबारा उगने में दशकों का समय लगता है।
चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना: आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड की महत्वाकांक्षी चारधाम सड़क परियोजना के तहत अब तक ५०,००० से अधिक पेड़ों की बलि दी जा चुकी है।
दिल्ली- देहरादून एक्सप्रेसवे: इस एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए उत्तराखंड की सीमा के भीतर ब्रिटिश काल के जंगलों सहित लगभग २,५०० से अधिक पेड़ों को साफ किया गया था।
थानों वन क्षेत्र का खतरा: देहरादून एयरपोर्ट जॉली ग्रांट के विस्तार के लिए थानों वन क्षेत्र के करीब १०,००० पेड़ों को काटने का प्रस्ताव सामने आया था, जो राजाजी नेशनल पार्क के इको-सेंसिटिव जोन के बेहद करीब है और इसका भी कड़ा विरोध हो रहा है।

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