मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : मी लॉर्ड...!

दिल्ली लाइव : मी लॉर्ड…!

अरुण कुमार गुप्ता

हिंदुस्थान की न्याय व्यवस्था पर समय-समय पर सवाल उठते रहते हैं। केरल से एक ऐसा ही मामला सामने आया, जिसे जानकर कोई भी व्यक्ति गुस्से से भर जाए। हम बात कर रहे हैं केरल की उस महिला की जिसे ब्रेस्ट वैंâसर हुआ था। गोरख नामक महिला को प्रारंभिक अवस्था में वैंâसर का पता चल गया था। शायद उसकी जान बच भी सकती थी, लेकिन इस देश की न्याय व्यवस्था ने उससे जीने का हक छीन लिया। यदि ऐसा कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा। गोरख को वैंâसर से लड़ने के लिए जिन दवाइयों की जरूरत थी, वे दवाइयां ही नहीं मिलीं। थक-हारकर इस महिला ने जून २०२२ में केरल हाई कोर्ट में गुहार लगाई। एक-एक दिन की देरी जानलेवा साबित हो रही थी। जून २०२२ से लेकर जनवरी २०२३ तक मामला ५७ बार कोर्ट की नजर में आया यानी सूचीबद्ध हुआ, लेकिन सुनवाई एक बार भी नहीं हुई। इस बीच लाइव सेविंग दवाओं को लेकर मदद करनेवाले ग्रुप ने सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई की अपील की, लेकिन इससे भी कुछ नहीं हुआ। दवाई के इंतजार में महिला ने दम तोड़ दिया। मजे की बात यह है कि मुकदमा आज तक चल रहा है। कोर्ट को अच्छी तरह मालूम है कि ग्लोबल वैंâसर ऑब्जर्वेटरी की २०२२ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल लगभग २ लाख महिलाओं को ब्रेस्ट वैंâसर होता है और लगभग १ लाख महिलाएं इससे मर भी जाती हैं, इसके बावजूद जज लोगों ने दवाई की व्यवस्था करना तो दूर सुनवाई तक नहीं की। जब पश्चिम बंगाल में २८ लाख लोगों के वोट बिना उनका पक्ष सुने काट दिए गए, तब ये लोग सुप्रीम कोर्ट गए तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई बात नहीं है, इस बार नहीं तो अगली बार चुनाव में वोट डाल देना। अब सोचिए, उस महिला और जिनके वोट काटे गए उनके घर वाले कोर्ट के बारे में क्या राय रखते होंगे। अब बस न्याय व्यवस्था को लेकर एनसीईआरटी की किताब में छपना नहीं चाहिए, नहीं तो उनका सम्मान कम हो जाएगा। यह सिर्फ दो मामले आपके सामने रखे हैं। पता नहीं ऐसे कितने मामले रोज कोर्ट में आते होंगे। अब आप कोर्ट के बारे में जो भी राय रखते हैं, मन में ही रखिए, नहीं तो कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट हो जाएगा।
कागज पर विश्वगुरु…पर शर्म मुझे आती नहीं!
इंडोनेशिया में गाने-बजाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे ही ऑस्ट्रेलिया पहुंचे मेलबर्न की सड़क मोदी वापस जाओ के नारे से गूंज उठी। मेलबर्न मीट के दौरान मोदी रेड कार्पेट पर चलते रहे और स्टेडियम के बाहर हजारों लोग मोदी के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन करते रहे। ह्यूमन राइट वाले हजारों लोग हाथों में पोस्टर लिए नारे लगाते हैं कि मोदी के देश में मीडिया को आजादी नहीं है और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर कर दी गई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री के सामने सबसे पहले यह तर्क देते हैं कि दोनों देश साथ-साथ हैं इसलिए एक और एक ११ होता है। नॉर्वे की पत्रकार से मोदी जी तो बच निकले, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में पत्रकारों के सामने नहीं बच पाए। ऑस्ट्रेलिया के पत्रकारों ने साफ कहा कि मोदी जी स्क्रिप्ट कॉन्प्रâेंस से बचते हैं और वहीं जाते हैं जहां स्टेज मैनेज हो सके। अब आप सोचिए, यह छवि है हमारे प्रधानमंत्री की विदेशी पत्रकारों के सामने। कायदे से मोदी जी को उन देशों की यात्रा से बचना चाहिए, जिन देशों की प्रेस प्रâीडम रैंकिंग भारत से अच्छी है। यदि जाते हैं तो अभिनेता अक्षय कुमार जैसे लोगों को साथ में रखें जो सवाल करें कि प्रधानमंत्री आम खाते हैं तो वैâसे खाते हैं। चूस कर खाते हैं या गुठली के साथ खाते हैं। यदि ऐसे सवाल पूछे जाएं तो असली सवालों से बच जाएंगे। मोदी जी आखिर कब तक दिखावे से देश चलेगा। वास्तव में कागज पर विश्वगुरु और हकीकत में कुछ और है। हकीकत में कुछ और क्या है, अब आप इस पर सोचते रहिए।

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