सामना सांवददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में सरकारी धन के उपयोग को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (वैâग) की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में पेश की गई वैâग ऑडिट रिपोर्ट-२०२४ के अनुसार, राज्य सरकार ने ऐसे छह हॉस्टलों को भी चार वर्षों तक १.६२ करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता जारी रखी, जहां एक भी छात्र नहीं रह रहा था। वैâग रिपोर्ट में राज्य सरकार के होस्टल को लेकर वित्तीय और प्रशासनिक कमियां उजागर हुई हैं। बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार उजागर हुआ है। वैâग ने इन संस्थानों को `घोस्ट हॉस्टल’ यानी केवल कागजों पर संचालित हॉस्टल बताया है।
महाराष्ट्र में `कागजी हॉस्टल’ घोटाला?
वैâग की रिपोर्ट के मुताबिक ये हॉस्टल वास्तव में बंद थे, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में इन्हें संचालित दिखाया जाता रहा और नियमित रूप से सरकारी फंड जारी होता रहा। वैâग ने इसे सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और वित्तीय निगरानी में गंभीर खामी का मामला बताया है। १० जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में पेश की गई इस रिपोर्ट में सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। ऑडिट में पाया गया कि विभाग ने वास्तविक स्थिति का सत्यापन किए बिना वर्षों तक इन संस्थानों को अनुदान जारी रखा। रिपोर्ट में केवल फंडिंग ही नहीं, बल्कि छात्रावासों की बुनियादी सुविधाओं, सुरक्षा, स्वच्छता और प्रशासनिक व्यवस्था में भी कई गंभीर कमियां उजागर की गई हैं। ऑडिट टीम ने १८ सरकारी और २१ सरकारी सहायता प्राप्त हॉस्टलों का स्थल निरीक्षण किया, जिसमें कई अनियमितताएं सामने आर्इं।
मार्च २०२४ तक महाराष्ट्र में ४४३ सरकारी और २,३८८ सरकारी सहायता प्राप्त हॉस्टल संचालित होने का रिकॉर्ड है। इनमें १२,१९७१ छात्र और ४०,५४३ छात्राएं निवासरत बताई गई हैं। इन छात्रावासों पर ऑडिट अवधि के दौरान राज्य सरकार ने २,३२१ करोड़ रुपए खर्च किए। वैâग की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हॉस्टल बंद थे और वहां कोई छात्र नहीं था, तो सरकारी धन किस आधार पर जारी किया गया? साथ ही यह भी कि इन अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और संस्थाओं के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी।
