-हंगामे के साये में शुरू हुआ संसद का मानसून सत्र
डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी
नई दिल्ली। संसद का मानसून सत्र २० जुलाई से शुरू होते ही सरकार के लिए ‘इम्तिहान’ बन गया। सदन के अंदर विपक्ष का हमला और बाहर सड़कों पर नौजवानों का आक्रोश, दोनों ने मिलकर मोदी सरकार को पहले ही दिन घेर लिया।
जैसे ही कार्यवाही शुरू हुई कांग्रेस, सपा और शिवसेना के सांसद वेल में कूद गए। मुद्दा था नीट पेपर लीक और राम मंदिर निर्माण में ‘चंदा चोरी’। विपक्ष ने आरोप लगाया कि करोड़ों नौजवानों का भविष्य बेच दिया गया और आस्था के नाम पर चंदे की लूट हुई। नारेबाजी और हंगामे के कारण लोकसभा-राज्यसभा की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। इसी अफरा-तफरी के बीच कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने चुपचाप सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ानेवाला बिल १९५६ पेश कर दिया। सरकार इस सत्र में इण्RA संशोधन समेत ८ विधेयक जबरन पास कराने की फिराक में है।
सदन के बाहर तस्वीर और भयावह थी। नीट पेपर लीक से आहत हजारों छात्र जंतर-मंतर से संसद की तरफ मार्च कर रहे थे। उनका एक ही सवाल था- ‘पेपर लीक कराने वालों को जेल कब?’ भीड़ बढ़ते ही दिल्ली पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया। आंसू गैस, वॉटर कैनन चले। आंदोलनकारी संसद के मुख्य द्वार तक पहुंच गए। अफरा-तफरी में पीएम मोदी को बैकडोर से निकाला गया।
इस आंदोलन और पुलिस कार्रवाई के कारण पूरा दिल्ली का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया। सुबह ११ बजे से शाम ५ बजे तक राजधानी की सभी प्रमुख सड़कें जाम हो गईं। मेट्रो, बस और दफ्तर जानेवाले लोग घंटों फंसे रहे। ५ बजे के बाद अचानक दिल्ली शांत हो गई। हमेशा जाम और शोर से भरी रहने वाली दिल्ली की सड़कों पर कर्फ्यू जैसा सन्नाटा था। चौराहे-चौराहे पर सिर्फ पुलिस ही पुलिस दिखाई दे रही थी।
छात्रों का गुस्सा सीधे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर है। उनका आरोप है कि ‘जिन्होंने वोट देकर पीएम को कुर्सी दी, आज उन्हीं के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है।’ मांग साफ है- धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें वरना आंदोलन और तेज होगा। इसी नीट मुद्दे को लेकर लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी २८ जून से दिल्ली में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। मंगलवार को जारी स्वास्थ्य बुलेटिन के अनुसार, उनका वजन ८.५ किलोग्राम कम हो चुका है और ब्लड प्रेशर १०९/७० दर्ज किया गया है। स्वास्थ्य में गिरावट के बावजूद सोनम ने अनशन तोड़ने से इनकार कर दिया है और कहा है कि वे आंदोलन को उसके ‘तार्किक निष्कर्ष’ तक ले जाएंगे। उनके इस आंदोलन को कई सामाजिक संगठन समर्थन दे रहे हैं। कुछ दिन पहले पुलिस ने उन्हें जबरन उठाकर अस्पताल में भर्ती कर दिया था, लेकिन अस्पताल के बेड पर भी सोनम का अनशन जारी है।
भाजपा के राज में हर आवाज को लाठी से दबाने की परंपरा बन गई है। सुप्रीम कोर्ट खुद कह चुका है कि भूख हड़ताल अभिव्यक्ति का संवैधानिक अधिकार है।
लेकिन सरकार सुनने को तैयार नहीं। जिन नौजवानों ने २०१४ से सरकार बनवाई, आज वही सड़कों पर हैं। ८ विधेयक बाद में, पहले देश के नौजवानों के सवालों का जवाब दीजिए – यही इस सत्र की सबसे बड़ी मांग है।
