मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तर की बात: डिंपल फैक्टर- २०२७, सपा की उभरती उम्मीद

उत्तर की बात: डिंपल फैक्टर- २०२७, सपा की उभरती उम्मीद

रोहित माहेश्वरी / लखनऊ

जंतर-मंतर पर डिंपल यादव का आक्रामक और संवेदनशील रूप समाजवादी पार्टी के लिए एक साधारण राजनीतिक दृश्य नहीं, बल्कि संभावनाओं से भरा संकेत है। नीट पेपर लीक और शिक्षा-व्यवस्था की गड़बड़ियों के खिलाफ जिस तरह उन्होंने प्रदर्शनकारियों के बीच जाकर बैरिकेड्स के सामने मोर्चा संभाला, वह उन्हें एक ऐसी नेता के रूप में स्थापित करता है जो केवल मंच से नहीं, सड़क से भी राजनीति करती हैं।
उत्तर प्रदेश की २०२७ विधानसभा लड़ाई अभी से आकार ले रही है। भाजपा अपने संगठन, जातीय संतुलन और हिंदुत्व आधारित राजनीति के सहारे तैयारी कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए सामाजिक न्याय का बड़ा गठजोड़ बनाना चाहती है। लेकिन केवल समीकरण पर्याप्त नहीं होते। चुनावी राजनीति में चेहरा भी चाहिए, भरोसा भी और भावनात्मक अपील भी। डिंपल यादव इन तीनों मोर्चों पर सपा के लिए नई ताकत बन सकती हैं। उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी यह है कि वे शोर नहीं, असर छोड़ती हैं। वे आक्रामक भी हैं और मर्यादित भी; संवेदनशील भी हैं और संघर्षशील भी। यही संतुलन उन्हें दूसरी महिला नेताओं से अलग पहचान देता है। छात्र आंदोलनों, बेरोजगारी, परीक्षा-व्यवस्था और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी उपस्थिति सपा को नए वर्गों तक पहुंचा सकती है। खासकर, युवा और महिला मतदाता के बीच उनका असर पार्टी की सामाजिक स्वीकार्यता को व्यापक बना सकता है।
हालांकि, सपा के लिए खतरा यह है कि वह इस छवि को केवल प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित न रहने दे। तस्वीरें भावनाएं जगाती हैं, पर संगठन चुनाव जिताता है। डिंपल फैक्टर तभी काम करेगा जब उसे बूथ स्तर की तैयारी, मजबूत उम्मीदवार चयन और जमीनी संवाद से जोड़ा जाए। वरना यह एक चमकदार क्षण बनकर रह जाएगा। फिर भी इतना साफ है कि डिंपल यादव ने सपा को एक नया राजनीतिक नैरेटिव दे दिया है। अब पार्टी के सामने चुनौती है कि वह इस नैरेटिव को नेतृत्व, मुद्दों और जनसमर्थन में कैसे बदलती है। २०२७ की लड़ाई में यही डिंपल पैâक्टर सपा की सबसे बड़ी उम्मीद भी बन सकता है और सबसे बड़ी परीक्षा भी।

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