राजन पारकर
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता की आवाज होती है। जब वही आवाज सड़कों पर उतरती है और उसके जवाब में डंडे बरसने लगते हैं, तब सवाल केवल पुलिस पर नहीं, बल्कि शासन की सोच पर उठते हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने यही संदेश दिया कि शांतिपूर्ण आंदोलन कोई अपराध नहीं है। यदि हर विरोध का उत्तर लाठीचार्ज होगा, तो संविधान की किताबें संग्रहालय में रख दीजिए और लोकतंत्र का बोर्ड उतार दीजिए। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि छात्र आंदोलन को शुरुआत में गंभीरता से लिया जाता, तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते। सत्ता ने संवाद की जगह शक्ति प्रदर्शन चुना और अंततः राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा। सूत्रों के अनुसार, पुलिस महकमे के कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी मानते हैं कि भीड़ नियंत्रण और अनावश्यक बल प्रयोग के बीच की रेखा कई बार पार कर दी जाती है। लोकतंत्र में पुलिस सरकार की नहीं, कानून की होती है। यदि यह मूल सिद्धांत भूला दिया जाए, तो जनता का भरोसा भी खो जाएगा।
लाठी, लापरवाही और लोकतंत्र!
राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने सत्ता, प्रशासन और पुलिस तीनों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कहीं छात्रों के आंदोलन पर बल प्रयोग को लेकर न्यायपालिका की सख्त टिप्पणी चर्चा में है, तो कहीं एक युवा आंदोलनकारी के परिवार की आर्थिक कुर्बानी व्यवस्था की संवेदनहीनता पर सवाल उठा रही है। दूसरी ओर मुंबई लोकल में सामने आए कथित घटनाक्रम ने प्रशासनिक जवाबदेही को फिर कटघरे में ला खड़ा किया है। सूत्रों के अनुसार, सत्ता के भीतर भी यह चिंता बढ़ रही है कि जनता अब केवल आश्वासन नहीं, जवाब मांग रही है।
साठ लाख का कर्ज और व्यवस्था पर करोड़ों सवाल
एक पिता कहता है बेटे की पढ़ाई के लिए साठ लाख का कर्ज लिया था। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है, जहां लाखों परिवार अपने बच्चों के भविष्य के लिए सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। चर्चा है कि जब युवाओं को अपनी पढ़ाई, परीक्षा और भविष्य के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है, तब असफल केवल कोई एक मंत्री नहीं होता, बल्कि पूरी व्यवस्था कटघरे में खड़ी हो जाती है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि आंदोलन के बाद कई दल अब युवाओं के बीच अपनी साख बचाने की रणनीति बनाने में जुटे हैं। क्योंकि जिसने युवाओं का विश्वास खो दिया, वह आने वाले चुनावों में सबसे बड़ी कीमत चुका सकता है। जनता का धैर्य असीम होता है, लेकिन जब वह टूटता है, तब सिंहासन भी डगमगा जाते हैं। आज वही बेचैनी सत्ता के गलियारों में महसूस की जा रही है।
मुंबई लोकल में इंसानियत भी टिकट लेकर चलती है क्या?
मुंबई की लोकल केवल रेलगाड़ी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी की धड़कन है। यदि उसी लोकल में किसी यात्री के साथ अमानवीय व्यवहार होने का आरोप सामने आए, तो यह केवल एक कर्मचारी का मामला नहीं रह जाता। यदि आरोप सही हैं तो यह कानून का नहीं, इंसानियत का भी अपराध है। और यदि आरोप गलत हैं, तो निष्पक्ष जांच के जरिए सच्चाई सामने आनी चाहिए। सूत्रों के अनुसार, रेलवे प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी है। लेकिन जनता पूछ रही है कि क्या हर गंभीर घटना के बाद केवल जांच ही होगी या जवाबदेही भी तय होगी? प्रशासन का अधिकार तभी तक सम्मानित रहता है, जब तक उसमें संवेदनशीलता बची रहती है। अधिकार जब अहंकार बन जाता है, तब जनता अदालत और मीडिया दोनों का दरवाजा खटखटाती है। सत्ता बदलती रहती है, कुर्सियां बदलती रहती हैं, अधिकारी बदलते रहते हैं; लेकिन लोकतंत्र का मूल मंत्र नहीं बदलता, जनता सर्वोपरि है।
