एम. एम. एस.
२० जुलाई को नई दिल्ली में आयोजित संसद मार्च के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और छात्रों पर हुए बल प्रयोग को लेकर उठ रहे सवालों ने अब नया मोड़ ले लिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सीआरपीएफ की आंतरिक जांच रिपोर्ट ने पुलिस और प्रशासन के उन शुरुआती दावों की पोल खोल दी है, जिनमें पैलेट गन के इस्तेमाल से साफ इनकार किया गया था।
जांच में आधिकारिक तौर पर पुष्टि हुई है कि कनॉट प्लेस इलाके में तैनात रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के एक जवान ने अपनी पैलेट गन से सात राउंड फायर किए थे, जिनमें से पांच सीधे प्रदर्शनकारियों को लगे। इस कार्रवाई में १९ वर्षीय छात्र साहिल की आंख की रोशनी जाने का खतरा पैदा हो गया, जबकि आउटलुक पत्रिका के एक पत्रकार समेत कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए।
उठते तीखे सवाल
जब घायलों के शरीर से निकले छर्रों और घटनास्थल की तस्वीरों ने सच बयां करना शुरू किया, तब दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर आधिकारिक बयान जारी कर पैलेट गन के इस्तेमाल की बात को झूठा और भ्रामक बताया था। अब, जब सुरक्षा बलों की अपनी ही रिपोर्ट में सात राउंड फायरिंग की पुष्टि हो चुकी है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि शुरुआत में जनता और मीडिया से गलत जानकारी क्यों साझा की गई? लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पूरे मामले पर केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर सवाल उठाया है, छात्रों पर पैलेट गन जैसे घातक हथियार के इस्तेमाल का आदेश किसने दिया था?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या दिल्ली की सड़कों पर अपने अधिकारों की मांग कर रहे छात्रों पर इस प्रकार के बल प्रयोग को गृह मंत्रालय की मंजूरी प्राप्त थी या फिर जमीनी स्तर पर तैनात जवानों ने फोर्स ग्रेडियंट (बल प्रयोग की निर्धारित प्रक्रिया) की अनदेखी करते हुए अपने स्तर पर यह कदम उठाया? यदि जांच में यह साबित होता है कि जवान ने निर्धारित नियमों का उल्लंघन किया, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। वहीं, यदि आदेश उच्च स्तर से दिया गया था तो जवाबदेही उससे जुड़े अधिकारियों की भी तय होनी चाहिए।
जवाबदेही तय होना जरूरी
आंतरिक समीक्षा में माना गया है कि भीड़ नियंत्रण के लिए तय मानकों जैसे चेतावनी देना, आंसू गैस का इस्तेमाल करना और उसके बाद लाठीचार्ज करना का चरणबद्ध तरीके से पालन नहीं किया गया। जब नियम स्पष्ट हैं कि ऐसे हथियारों का प्रयोग अंतिम विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए, तो बिना पूर्व चेतावनी के यह कार्रवाई किसके निर्देश पर की गई? अब, जब तस्वीर काफी हद तक साफ हो चुकी है, तो केवल आंतरिक समीक्षा से काम नहीं चलेगा। देश के युवा और लोकतंत्र दोनों यह जानने का अधिकार रखते हैं कि इस कार्रवाई का वास्तविक जिम्मेदार कौन है और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी।
