-महाराष्ट्र सरकार लौटा सकी सिर्फ १८७
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था की भयावह तस्वीर सामने आई है। राज्य में १४ से १८ वर्ष आयु वर्ग के करीब ११,८५,४१२ बच्चे स्कूल से बाहर हैं, लेकिन सरकार इनमें से केवल १८७ बच्चों को ही मुक्त विद्यालय प्रणाली के जरिए दोबारा पढ़ाई से जोड़ सकी। यह आंकड़ा जून २०२६ में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की परियोजना अनुमोदन बोर्ड की बैठक के विवरण में दर्ज किया गया है।
राज्य ने जनवरी २०१९ में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान की तर्ज पर अपनी व्यवस्था शुरू की थी और २०२५ में केंद्र को भरोसा दिया था कि विशेष अभियान चलाकर स्कूल छोड़ चुके बच्चों को वापस लाया जाएगा। इसके बावजूद प्रगति लगभग नगण्य रही। बोर्ड ने सरकार को अधिक ड्रॉपआउट वाले जिलों, गांवों और बस्तियों की पहचान कर घर-घर सर्वे कराने के निर्देश दिए हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, बाल विवाह, बाल मजदूरी, गरीबी और परिवारों का पलायन बच्चों की पढ़ाई छूटने की प्रमुख वजहें हैं। गन्ना कटाई और ईंट भट्ठों पर जाने वाले परिवारों के बच्चे लंबे समय तक विद्यालय से दूर रहते हैं। शहरों में भी स्थिति बेहतर नहीं है। धारावी जैसे इलाकों में कई लड़कियां सातवीं-आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं, जबकि लड़के नौवीं-दसवीं के बाद रोजगार में लग जाते हैं। सवाल यह है कि लाखों बच्चों के भविष्य के लिए बनाई गई योजना केवल १८७ के आंकड़े पर क्यों सिमट गई? यह उपलब्धि नहीं, सरकार की नीतिगत विफलता का प्रमाण है।
रोज पढ़ाई से दूर हो रहे बच्चे
गरीबी, पलायन, बाल मजदूरी और बाल विवाह के कारण लाखों बच्चे स्कूल से बाहर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी पुनर्वास और शिक्षा अभियान नहीं चलाया गया, तो यह पीढ़ी स्थायी रूप से शिक्षा और बेहतर भविष्य से वंचित हो सकती है।
