-छात्रों की आवाज दबाने के लिए सड़क से सोशल मीडिया तक शिकंजा; सवाल पूछने वाले युवाओं को अपराधी बनाने की कोशिश जारी
सामना संवाददाता / मुंबई
प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवाओं को पहले पुलिस वैन में भरा गया था, फिर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गर्इं और अब आंदोलन के समर्थन में खड़े लोगों को सोशल मीडिया पर बदनाम करने का सिलसिला शुरू हो गया है। साथ ही निजी एफआईआर दर्ज करने की भूमिका भी बनाई जा रही है। लिहाजा मुंबई समेत देशभर में छात्र आंदोलन के बाद सामने आ रही घटनाओं ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या असहमति जताने वाले युवाओं को सुनने के बजाय डराने, थकाने और चुप कराने की रणनीति अपनाई जा रही है।
वैन रोकने वाली रिया पर ऑनलाइन हमला
शिवाजी पार्क के पास प्रदर्शनकारियों से भरी पुलिस वैन के आगे खड़ी होकर उसे रोकने वाली मॉडल रिया यादव आंदोलन के प्रतिरोध का प्रमुख चेहरा बन गर्इं थीं। लेकिन इस घटना के बाद रिया को सोशल मीडिया पर कथित रूप से गालियां, धमकियां और चरित्र पर हमला करने वाली पोस्ट मिलने लगीं। उनकी तस्वीरों का इस्तेमाल करके निजी जीवन और कमाई से जुड़े अपमानजनक तथा कथित रूप से झूठे दावे पैâलाए गए। इसे लेकर अब रिया ने महाराष्ट्र पुलिस की साइबर सेल से शिकायत कर डिजिटल साक्ष्य सौंपे हैं।
जवाब मांगते सवाल
सामूहिक एफआईआर दर्ज करने का आधार क्या था?
कितने आरोपी वीडियो या प्रत्यक्ष साक्ष्य से पहचाने गए?
शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गंभीर धाराएं क्यों लगाई गर्इं?
नशीला पदार्थ रखकर फंसाने की धमकी देने वाले पुलिसकर्मी पर केवल निलंबन ही क्यों?
एके-४७ और पैलेट गन पर स्पष्टता क्यों नहीं?
रिया यादव के खिलाफ अपमानजनक अभियान चलाने वाले खाते किसके हैं?
क्या पुलिस इन खातों के आपसी संबंध और धन के स्रोत की जांच करेगी?
सरकार छात्रों से संवाद करेगी या एफआईआर के सहारे आंदोलन दबाएगी?
सड़क पर पुलिस, इंटरनेट पर ट्रोल?
यह पूरा घटनाक्रम एक खतरनाक पैटर्न की ओर इशारा करता है। पहले आंदोलनकारियों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोको, फिर हिरासत में लो, एफआईआर दर्ज करो और आंदोलन का चेहरा बनने वालों पर सोशल मीडिया से हमला करवा दो। हालांकि किसी संगठित ‘ट्रोल सेना’ के निर्देशित होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन एक साथ पैâलती अपमानजनक पोस्ट और निजी चरित्र पर हमलों की जांच जरूरी है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी छात्र प्रदर्शनों से जुड़े डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने और आपराधिक इतिहास न रखने वाले नाबालिग प्रदर्शनकारियों को रिहा करने का निर्देश दिया है। अदालत की टिप्पणी ने पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही के सवाल को और भी गंभीर बना दिया है। युवाओं ने परीक्षा व्यवस्था में जवाब मांगा था। जवाब में उन्हें पुलिस वैन, मुकदमे और ऑनलाइन गालियां मिलीं। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होता।
