तौसीफ
लोकतंत्र की असली तस्वीर कई बार संसद भवन के भीतर नहीं, बल्कि थाने की चौखट पर दिखाई देती है। दिल्ली के संसद मार्ग पर ऐसा ही एक दृश्य सामने आया, जहां नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी एक कथित पैलेट गन हमले के पीड़ित साहिल लोचब के साथ खड़े नजर आए। सवाल सिर्फ एक शिकायत का नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था का था, जहां एक पीड़ित को अपनी बात दर्ज कराने के लिए दर-दर भटकना पड़े।
मामला मंदिर मार्ग थाने से शुरू हुआ। राहुल गांधी पीड़ित के साथ शिकायत दर्ज कराने पहुंचे, लेकिन वहां शिकायत दर्ज नहीं हो सकी। इसके बाद वे संसद मार्ग थाने पहुंचे। वहां भी बात नहीं बनी तो राहुल गांधी अपने वकीलों के साथ डीसीपी कार्यालय पहुंचे और धरने पर बैठ गए।
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है। नेता प्रतिपक्ष का पद केवल राजनीतिक हैसियत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका है। ऐसे में यदि एक पीड़ित की शिकायत दर्ज कराने के लिए नेता प्रतिपक्ष को पुलिस अधिकारियों के दफ्तर तक जाना पड़े, तो आम नागरिक की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। एफआईआर महज कागज का टुकड़ा नहीं होती। शिकायत दर्ज होना जवाबदेही की पहली सीढ़ी है।
