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त्योहारों की मिठास को लगी मोदी सरकार की नजर!

-इथेनॉल की जिद में चीनी हो गई कड़वी

-३१ लाख टन चीनी बराबर गन्ना और शीरा इथेनॉल उत्पादन में खपा
-नतीजा, नेट चीनी उत्पादन करीब २.९३ करोड़ टन घटा
-अब १० लाख टन कच्ची चीनी होगी आयात; आयात शुल्क किया गया शून्य

अनिल तिवारी

गणेशोत्सव, नवरात्र, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहारों से ठीक पहले चीनी के बाजार में बढ़ती बेचैनी ने आम परिवार की रसोई से लेकर हलवाइयों तक की चिंता बढ़ा दी है। जिस समय मिठाइयों की मांग तेजी से बढ़ती है, उसी दौर में सरकार को चीनी के स्टॉक पर सख्ती करनी पड़ रही है और १० लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात का रास्ता खोलना पड़ा है।
त्योहारी सीजन में मिठाई, बेकरी, शीतल पेय और खाद्य उद्योग में चीनी की मांग सामान्य महीनों से अधिक रहती है। ऐसे में यदि थोक कीमतों में तेजी बनी रही तो उसका बोझ आखिरकार आम ग्राहक की जेब पर ही आएगा। यानी इथेनॉल से पेट्रोल सस्ता हुआ या नहीं, इसका हिसाब अलग है; फिलहाल खतरा यह है कि त्योहारों की मिठास कहीं सरकारी इथेनॉल नीति की कीमत न चुका बैठे।
जिस भारत की पहचान दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक और निर्यातक देशों में रही है, वही भारत अब करीब एक दशक बाद १० लाख टन कच्ची चीनी आयात करने जा रहा है। केंद्र सरकार ने ३१ अक्टूबर तक इसके आयात पर शुल्क शून्य कर दिया है। सामान्य तौर पर चीनी आयात पर १०० प्रतिशत तक शुल्क लगता रहा है। सरकार का यह पैâसला अपने आप में बता रहा है कि घरेलू बाजार में हालात सामान्य नहीं हैं।
विपक्ष ने इसी पर केंद्र को घेरा है। आरोप है कि पेट्रोल में २० प्रतिशत इथेनॉल मिलाने की सरकार की जल्दबाजी ने गन्ने को चीनी के बजाय र्इंधन की तरफ मोड़ दिया और अब उसका खामियाजा उपभोक्ता महंगी चीनी के रूप में चुका रहा है। इसे केवल राजनीतिक आरोप कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े कम-से-कम यह जरूर बताते हैं कि इथेनॉल के लिए चीनी का बड़ा हिस्सा सचमुच डायवर्ट हुआ है।
भारतीय चीनी एवं जैव-ऊर्जा निर्माता संघ के अनुमान के मुताबिक, २०२५-२६ में सकल चीनी उत्पादन करीब ३.२४ करोड़ टन रहने का अनुमान था, लेकिन इसमें से लगभग ३१ लाख टन चीनी के बराबर गन्ना और शीरा इथेनॉल उत्पादन मे खप गया। यानी इथेनॉल डायवर्जन के बाद नेट चीनी उत्पादन करीब २.९३ करोड़ टन रह जाता है।
रेटिंग एजेंसी इक्रा ने मई में और भी गंभीर तस्वीर रखी थी। उसके मुताबिक इथेनॉल के लिए करीब ३१ लाख टन के डायवर्जन के बाद चीनी की उपलब्धता लगभग २.८ करोड़ टन, जबकि घरेलू खपत करीब २.८३ करोड़ टन रह सकती है। इसके साथ लगभग सात लाख टन निर्यात पहले ही हो चुका था। सितंबर तक क्लोजिंग स्टॉक करीब ४३ लाख टन रहने का अनुमान था, पिछले साल के ५३ लाख टन से कम। सरकार पिछले कुछ सप्ताह में चीनी के स्टॉक पर पाबंदियां लगा चुकी है। १ अगस्त से व्यापारियों के लिए स्टॉक होल्डिंग लिमिट लगाई गई और अब थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक सीमा ३० दिन से घटाकर १५ दिन की गई है। बाजार में एक्स-मिल चीनी की कीमतें कुछ दिनों में करीब १० रुपए किलो तक उछलने की रिपोर्ट है।
दूसरा सवाल वाहनों का है। सरकार लगातार कह रही है कि ई-२० से व्यापक इंजन खराबी का कोई प्रमाण नहीं है और आधुनिक ई-२० अनुकूल वाहनों को इससे नुकसान नहीं होना चाहिए, लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है। केंद्र के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन तक ने पुराने वाहनों के लिए ई-१० जैसे कम इथेनॉल वाले पेट्रोल का विकल्प वापस देने की पैरवी की है। उन्होंने खासकर पुराने दोपहिया वाहनों के रबर सील और पुर्जों की अनुकूलता को लेकर उपभोक्ताओं की चिंताओं को जायज मुद्दा माना है। यानी सवाल यह नहीं कि इथेनॉल चाहिए या नहीं। सवाल है, क्या २० प्रतिशत मिश्रण पूरे देश पर इतनी तेजी से थोपना जरूरी था?
एक ओर उपभोक्ता को ई-१० का विकल्प नहीं, दूसरी ओर लाखों टन चीनी के बराबर गन्ना इथेनॉल में जा रहा है और तीसरी ओर सरकार को १० लाख टन चीनी विदेश से मंगानी पड़ रही है। इसे संयोग बताना मुश्किल है। इथेनॉल से विदेशी मुद्रा बचाने निकली नीति यदि अंतत: चीनी आयात पर विदेशी मुद्रा खर्च कराए, पेट्रोल उपभोक्ता को विकल्प से वंचित करे और त्योहारों से पहले रसोई का बजट बिगाड़ दे, तो सरकार को उपलब्धियों का विज्ञापन नहीं, पूरे आर्थिक हिसाब की सार्वजनिक ऑडिट करानी चाहिए। क्योंकि अब सवाल विपक्ष का नहीं है, सरकार के अपने आंकड़े पूछ रहे हैं कि इथेनॉल की इस दौड़ की असली कीमत आखिर कौन चुका रहा है?

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