ऐन त्योहारों के मौसम में सरकार आम लोगों को महंगाई के झटके दे रही है। इसमें भी चीनी के दाम ६५ से ७० रुपए प्रति किलो तक पहुंचने से ऐन त्योहारों में आम लोगों का मुंह कड़वा होने वाला है। पिछले १५ दिनों में चीनी के दाम में १७ रुपए तक की बढ़ोतरी हुई है। हमेशा की तरह सत्ताधारियों को इस बारे में देर से होश आया है। अब कहा जा रहा है कि सरकार ने चीनी की बढ़ती कीमतों पर कठोर कदम उठाए हैं। चीनी की जमाखोरी के खिलाफ नियम एवं प्रतिबंध और कड़े किए गए हैं। महंगाई तथा दाम बढ़ने पर सरकार के ये ‘कड़े’ और ‘कठोर’ उपाय हमेशा ‘बारात के पीछे घोड़े’ की तरह क्यों दौड़ते हैं? देश में चीनी की किल्लत हो सकती है, उससे जनता पर महंगाई का बोझ पड़ सकता है, इसका अंदाजा सरकार को पहले क्यों नहीं आता? पिछले साल की तुलना में इस साल चीनी का उत्पादन थोड़ा बढ़ने पर भी चीनी के दाम में ऐतिहासिक बढ़ोतरी हुई है। इसका दोष सरकार की गलत गन्ना नीति का ही है। पिछले साल देश में २५८ लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। इस साल वह २७६ लाख टन हुआ है, लेकिन देश की कुल जरूरत के हिसाब से यह कम ही है। ऊपर से केंद्र में बैठे सत्ताधारियों पर अभी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की सनक चढ़ी हुई है। सरकार की नीति इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की है। इसीलिए पेट्रोल में २० प्रतिशत
इथेनॉल मिलाया
जा रहा है। उसी का नतीजा अब चीनी की कमी और दाम बढ़ने के रूप में सामने आया है। जिस गन्ने से चीनी बनानी थी, उसी गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में हो रहा है और उस इथेनॉल की कीमत चीनी की महंगाई के रूप में आम लोगों को चुकानी पड़ रही है। केंद्र सरकार की यह उल्टी नीति है। लेकिन उन्होंने अपने कानों में ‘ई-२०’ नीति की रूई ठूंस रखी है। ऐसे में चीनी की दरवृद्धि के खिलाफ जनता का गुस्सा और आक्रोश उनके कानों तक वैâसे पहुंचेगा? इथेनॉल और ‘ई-२०’ नीति की आरती अपने ही चारों तरफ उतारने में मोदी सरकार मग्न रही। मोदी की वजह से ही इससे वैâसे क्रांतिकारी र्इंधन और विदेशी मुद्रा की बचत हुई, इसका ढोल सरकार की भक्त-मंडली पीटती रही। चीनी की दरवृद्धि का अंदाजा या तो सरकार को आया ही नहीं या आकर भी सरकार हमेशा की तरह बेफिक्र रही। कारण चाहे जो भी हों, चीनी की महंगाई का झटका आम लोगों को ही सहना पड़ रहा है। अब कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार इथेनॉल उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने के बारे में सोच रही है। थोक और खुदरा बाजार में चीनी के स्टॉक के नियम और कड़े किए गए हैं। उसके अनुसार, व्यापारी १० प्रतिशत से ज्यादा चीनी १५ दिन से ज्यादा समय तक नहीं रख सकेंगे। उस पर
बैल गया तब नींद खुली
की तरह सरकार अब १० लाख टन चीनी आयात करने जा रही है। मामला कुछ ऐसा ही है। इथेनॉल नीति की वजह से चीनी और दूसरे अनाजों की कमी होगी और जनता पर महंगाई का बोझ पड़ेगा, इसका सीधा अंदाजा भी अगर सरकार के नीति-निर्माताओं को नहीं है तो उन्हें सरकार में बैठने पर नालायक ही कहा जाना चाहिए। उनके इस ‘नालायक’ कारोबार की वजह से सिर्फ चीनी ही नहीं, गुड़ के दाम भी भड़क गए हैं। फिर इस महंगाई का फायदा गन्ना उत्पादकों को मिलेगा क्या? तो वह भी नहीं। हमेशा की तरह इसका फायदा व्यापारियों की जेब में ही जा रहा है। मोदी सरकार भारत की ५ ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का अनुमान छाती ठोककर बताती है, लेकिन अपनी ही इथेनॉल नीति की वजह से चीनी की कमी होगी और चीनी के दाम ‘अभूतपूर्व’ बढ़कर आम जनता के गणपति-नवरात्रोत्सव ‘कड़वे’ कर देंगे, इसका सीधा अंदाजा ‘विश्वगुरु’ को नहीं होता। मोदी सरकार का कामकाज ऐसे ही रामभरोसे चल रहा है। इसी वजह से पेट्रोल-डीजल से लेकर सोना-चांदी तक, गुड़-चीनी से लेकर दूध, प्याज-आलू तक, रिक्शा-टैक्सी से लेकर एसटी तक हर जगह महंगाई की आग लगी हुई है। इसमें आम लोग झुलस रहे हैं। यह मोदी सरकार का ही पाप है।
