मुख्यपृष्ठस्तंभउड़न छू: दिमागी नक्सली

उड़न छू: दिमागी नक्सली

अजय भट्टाचार्य

देश पर कब्जा बनाये रखने की आखिरी और उतनी ही कायरतापूर्ण कोशिश ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल था। वह भी उल्टा पड़ गया। ‘कॉकरोच’ शब्द युवाओं को एक साथ लाया, ‘दिमागी नक्सल’ शब्द समझदार नागरिकों को एक साथ ला रहा है। इस शब्द पर सत्ता विरोधी लोगों में पहले कभी नहीं देखी गई एकता दिखी है। परिधान मंत्री के जानलेवा शब्द हर जगह उड़ रहे हैं। वरिष्ठ नागरिकों के कैरिकेचर से लेकर जेन-जी के मीम्स तक, इस शब्द पर इतना मसाला बन रहा है कि संघ सहित भाजपा खुद इस शब्द का खामियाजा भुगतेगी।
अब से वे जो भी करेंगे, वह उन्हें ही परेशान करेगा। यह सिलसिला उल्टा होने लगा है। मूलत: जब एक ऐसे संगठन के लोग, जिसकी विचारधारा ने राष्ट्रपिता की हत्या की हो, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज तक को अस्वीकार किया हो, देश की बागडोर अपने हाथ में ले लें और दूसरों को देशद्रोही घोषित करने लगें, तो ‘हद हो गई और हंसी उड़ी’ तो होना ही है। असली देशद्रोही कौन हैं, इस पर पिछले बारह वर्षों से चल रही चर्चा का कारण संघ-भाजपा के लोगों का किसी को भी नक्सलवादी घोषित करने की जिद है। अब युवा पीढ़ी अच्छी तरह जान चुकी है कि असली देशद्रोही कौन हैं। बच्चे सत्ता प्रतिष्ठान की खाल उधेड़ रहे हैं। एक समय था, जब संघ की देशभक्ति एक छिपी हुई मुट्ठी थी, जो पिछले बारह वर्षों से हर दिन उजागर हो रही है। मूलत: संघ के गठन में व्यापक जनहित का कोई विचार नहीं किया गया। तिलक की मृत्यु के बाद गांधी आए और कांग्रेस का लोकतंत्रीकरण शुरू हुआ। अब हेडगेवार और उनके ब्राह्मण साथियों को यह समझ में आ गया कि कांग्रेस में उनके लिए कोई गुंजाइश नहीं है, जो संघ के जन्म का मूल कारण थी। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया है कि अंग्रेजों ने उस समय की खुफिया एजेंसी की मदद से यह संगठन बनाया था, ताकि उन्हें देश की खबरें पता चलें। अगर हम इसे नजरअंदाज भी कर दें, तो भी यह सवाल बना रहता है कि आजादी की लड़ाई में संघ का क्या योगदान था। लोग लगातार यह सवाल पूछ रहे हैं और संघ के पास कुछ कहने को नहीं है। एक तरफ वे ‘घर-घर तिरंगा’ रैलियां करेंगे और उसी समय१५ अगस्त को ‘भगवा ही राष्ट्रीय ध्वज है’ भी कहेंगे। वे जन गण मन के विरोध में पूरा वंदे मातरम लेकर आएंगे। असल में, संघ का न तो जन गण मन से कोई लेना-देना है, न ही वंदे मातरम से। अगर है, तो सिर्फ नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि से। छोटे बच्चे इस बेवकूफी को समझते हैं। यह नकली राष्ट्रवाद अब हर दिन सामने आ रहा है। इसके अपने गवर्नर ने घर से ही ‘पुलवामा का सच’ सामने लाकर इसकी शुरुआत की थी। मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप के एक ट्वीट पर पाकिस्तान के साथ सीजफायर की घोषणा करके इसे साबित कर दिया। पिछले बारह सालों में संघ और भाजपा का नकली राष्ट्रवाद इस हद तक सामने आ गया है कि अब जनता के मन में यह बात इतनी गहरी हो गई है कि जिन्हें वे देशद्रोही मानते हैं, वही सच्चे देशभक्त हैं। अब संघ जितना खुद को देशभक्त दिखाने की कोशिश करेगा, उतना ही वह खुद पर सवाल उठाएगा। इसलिए, दिमागी नक्सल जैसे शब्दों का स्वागत है। मोदी को ऐसे और नए शब्द खोजने और संघ-भाजपा को मुश्किल में डालने के लिए शुभकामनाएं।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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