मुख्यपृष्ठस्तंभकांव-कांव: जवाबदेही... चल हट भाग, टेंशन देती थी!

कांव-कांव: जवाबदेही… चल हट भाग, टेंशन देती थी!

हरिगोविंद विश्वकर्मा

जब से मैंने होश संभाला था, तब से मैं हर ऐरे-गैरों-नत्थू-खैरे के प्रति खुद को जवाबदेह मान लेता था। नतीजा बहुत भयावह होता था… फ़ुल टेंशन। हमेशा परेशान रहता था। रात को नींद नहीं आती थी। एक दिन अचानक मुझे ज्ञानी बाबा मिल गए। वह लोगों को ज्ञान बांट रहे थे। मैं भी बैठ गया। उन्होंने कहा, ‘इंसान की सारी टेंशन की जड़ जवाबदेही है। अगर टेंशन-प्रâी जीवन जीना है तो खुद को जवाबदेही से मुक्त कर दो।’
उन्होंने अपना उदाहरण दिया, ‘जब से मैंने खुद को जवाबदेही से मुक्त किया है, जिंदगी के मजे ले रहा हूं। आप भी जवाबदेही से मुक्त हो जाइए। तब आप दिल्ली में भी मौसम का मजा ले सकते हैं।’ उनके अनमोल वचन सुनकर मन किया कि चरणों में अपना तकिया रखकर सो जाऊं। इतना गहरा ज्ञान, वह भी नि:शुल्क! अगर किसी आश्रम में जाता तो ऐसी अनमोल बात सुनने के लिए हजारों रुपए खर्च करने पड़ते। यहां तो ज्ञान मुफ्त में चारों ओर उड़ रहा था। मैं जितना सुनता गया, उतना ही प्रभावित होता गया। जवाबदेही छोड़ते ही चित्त शांत? तो क्या सारी दुनिया अब तक गलत मार्ग पर थी? क्या सदियों से राजाओं-महाराजाओं ने जिम्मेदारी और जवाबदेही जैसे खतरनाक शौक पाल रखे थे और इसी वजह से उनकी नींद खराब होती थी? मुझे लगा, ज्ञानी बाबा मानव-इतिहास के सबसे बड़े सेल्फ-केयर कोच हैं। बस क्या था, मैंने भी इस कमबख्त जवाबदेही से खुद को मुक्त कर लिया। अब टेंशन-प्रâी रहता हूं। चित्त शांत रहता है और अच्छी नींद आती है।
जवाबदेही, दरअसल, एक बीमारी है। हमें बचपन से गलत सीख मिलती है… जिम्मेदारी लें, जवाबदेही निभाएं, लोगों की अपेक्षाएं पूरी करें। ये सब टेंशन देने वाले टॉक्सिंस निकले। असल में जवाबदेही नींद न आने, समाज की परवाह करने और सबसे खतरनाक आत्मग्लानि जैसी बीमारियों की जड़ है। ज्ञानी बाबा के वचन मानवता के टीके जैसे हैं, जवाबदेही-विहीनता का टीका। एक बार लगा लो और फिर आनंद-ही-आनंद। अब सुबह उठते ही मेरा पहला काम होता है किसी भी गलती की जिम्मेदारी न लेना। चाय खौलकर बाहर आ गई तो चाय की जिम्मेदारी। पड़ोसी के बच्चे ने क्रिकेट खेलते हुए खिड़की तोड़ दी तो बच्चे की गतिविधि पर समाज की विफलता। कार का टायर पंचर हुआ तो सड़क की गड़बड़ी। दफ्तर देर से पहुंचे तो ट्रैफिक का षड्यंत्र। अब समझ में आया कि जीवन की सारी परेशानियों की जड़ जवाबदेही है और सारी खुशियों की जड़ उसका त्याग। जवाबदेही छोड़ते ही मन में शांति की गंगा बहने लगी। और सच कहें तो एक बार कुर्सी मिल जाए तो जवाबदेही की जरूरत ही किसे है? कुर्सी का साधक वही बन सकता है, जो जिम्मेदारी को ‘रास्ते की धूल’ समझकर झाड़ दे। कुर्सी और जिम्मेदारी एक साथ रखी नहीं जातीं। ये दोनों परस्पर विरोधी संस्कारी तत्व हैं। आजकल कोई भी थोड़े दिन किसी पद पर बैठ जाए तो कहता घूमता है, ‘आप नाहक परेशान हो रहे हैं? मैं हूं न।’ लेकिन ज्ञानी बाबा कहते हैं, ‘आप नाहक परेशान होते हैं? आपकी परेशानी काल्पनिक है। मैं भी नहीं हूं…’
यही है आधुनिक नेतृत्व का सार… उपस्थित रहकर भी जिम्मेदारी से अनुपस्थित रहना। जब लोग किसी समस्या का समाधान पूछते हैं तो जवाब मिलता है, ‘चित्त शांत रखें, समस्या खुद ही खत्म हो जाएगी। अगर तब भी चित्त शांत न हो तो अनुलोम-विलोम करें।’
ज्ञानी बाबा की बात सुनकर लोग पहली बार भ्रम में पड़ते हैं, दूसरी बार ग़ुस्से में आते हैं और तीसरी बार निराशा में डूब जाते हैं। लेकिन बाबा अडिग और शांत रहते हैं… जैसे हिमालय की चोटी पर ध्यानमग्न साधु। फर्क बस इतना कि वह साधु पहाड़ पर होता है और ये साधु एयर-कंडीशंड ऑफिस में, एयर प्यूरिफायर के सामने।
जवाबदेही-मुक्त जीवन के कुछ सिद्धांत भी हैं… जो काम करें, उसका श्रेय ले लें और जो काम न हो सके, उसकी जिम्मेदारी बिल्कुल न लें। बिजली चली गई तो, ‘मुझसे क्यों पूछ रहे हो?’ सड़क टूटी है तो, ‘मैं सिविल इंजीनियर थोड़े ही हूं!’ वादा पूरा नहीं हुआ तो, ‘आपने बहुत उम्मीदें पाल ली थीं, इसमें मेरा क्या दोष है?’ सोचिए, अगर हर आदमी जवाबदेही छोड़ दे तो देश में वैâसा चमत्कार होगा! कोई शिकायत नहीं करेगा, कोई किसी की गलती पर झगड़ेगा नहीं। हर आदमी बस एक ही वाक्य बोलेगा, ‘मुझसे क्यों पूछ रहे हो? मैं क्या जानूं?’
ज्ञानी बाबा ने हमें सिखाया है… जवाबदेही छोड़ें, शांति प्राप्त करें। जैसे नियम छोड़ें, आजादी पाएं। हां, जवाबदेही छोड़ते ही जनता आपको सेवा का मौका देगी। फिर आपकी कोई जवाबदेही ही नहीं रहेगी…न समाज के प्रति, न जनता के प्रति, और न ही देश के प्रति।

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