जंगल, पहाड़ और समुद्र में भी मोबाइल रहेगा ‘ऑन’
मोबाइल नेटवर्क की दुनिया अब बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है। आने वाले समय में आपका स्मार्टफोन सिर्फ जमीन पर लगे मोबाइल टावरों पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट से जुड़ सकेगा। इस तकनीक को डायरेक्ट-टू-डिवाइस यानी डी२डी कहा जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा उन इलाकों में होगा, जहां मोबाइल टावर लगाना मुश्किल या बेहद महंगा है। घने जंगल, ऊंचे पहाड़, रेगिस्तान, समुद्री क्षेत्र या प्राकृतिक आपदा से प्रभावित इलाकों में भी फोन को नेटवर्क मिल सकता है।
सामान्य मोबाइल नेटवर्क में आपका फोन नजदीकी टावर से जुड़ता है। इसके बाद कॉल, संदेश और इंटरनेट की सेवा आगे नेटवर्क तक पहुंचती है। डायरेक्ट-टू-डिवाइस व्यवस्था में यही काम सैटेलाइट करती है। लो-अर्थ ऑर्बिट में घूम रहे उपग्रह मोबाइल फोन से सीधे रेडियो सिग्नल पकड़ते और भेजते हैं। यानी बीच में मोबाइल टावर की जरूरत कम हो सकती है। खास बात यह है कि इस तकनीक का लक्ष्य ऐसे सामान्य स्मार्टफोन को भी सैटेलाइट नेटवर्क से जोड़ना है, जिनमें अलग से भारी सैटेलाइट एंटीना लगाने की जरूरत न पड़े।
शुरुआत संदेश से,
आगे इंटरनेट तक
शुरुआती चरण में इस तकनीक का इस्तेमाल आपातकालीन संदेश, एसएमएस और सीमित डेटा सेवाओं के लिए किया जा रहा है। तकनीक के विकसित होने के साथ वॉयस कॉल और तेज इंटरनेट तक पहुंच संभव होने की उम्मीद है। इसका अर्थ यह नहीं कि मोबाइल टावर खत्म हो जाएंगे। शहरों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जमीन आधारित नेटवर्क अभी भी ज्यादा तेज और सस्ता रहेगा। सैटेलाइट नेटवर्क मुख्य रूप से उन जगहों का ‘नेटवर्क गैप’ भर सकता है, जहां अभी मोबाइल कवरेज नहीं पहुंचता।
आपदा में बन सकती है जीवनरेखा
भूकंप, बाढ़ या तूफान के दौरान अक्सर मोबाइल टावर और बिजली व्यवस्था ठप हो जाती है। ऐसे समय में सैटेलाइट से सीधे जुड़ने वाला फोन राहत एजेंसियों और आम लोगों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकता है। तकनीक का संदेश साफ है- भविष्य में मोबाइल की स्क्रीन पर नेटवर्क की पांच डंडियां दिखाने के लिए जरूरी नहीं कि आसपास कोई टावर खड़ा हो; नेटवर्क सीधे आसमान से उतर सकता है।
भारत में स्टारलिंक की एंट्री का इंतजार जारी है, लेकिन एलन मस्क ने एक बार फिर सैटेलाइट इंटरनेट की जरूरत पर जोर दिया है। मस्क का कहना है कि स्टारलिंक जैसी तकनीक उन ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में तेज इंटरनेट पहुंचा सकती है, जहां फाइबर नेटवर्क या मोबाइल टावर पहुंचाना मुश्किल और महंगा है। सैटेलाइट आधारित सेवा सीधे अंतरिक्ष से इंटरनेट उपलब्ध कराती है, इसलिए पहाड़ी, जंगल और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी कनेक्टिविटी बेहतर हो सकती है। भारत में स्टारलिंक की शुरुआत नियामकीय मंजूरियों, स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा संबंधी प्रक्रियाओं के पूरा होने पर निर्भर करेगी।
