मुख्यपृष्ठनए समाचारराम के चंदे पर अपनों की महाभारत!

राम के चंदे पर अपनों की महाभारत!

 – नृपेंद्र बोले ‘डकैती’, चंपत ने नौ पन्नों में गिनाई उनकी जिम्मेदारी
-सवाल-इतने बड़े मंदिर तंत्र में आखिर जवाबदेह कौन?

अयोध्या में अब लड़ाई मंदिर बनाम मस्जिद की नहीं, मंदिर के भीतर जिम्मेदारी किसकी थी- इसकी हो चली है। राम मंदिर के चंदे में कथित गड़बड़ियों ने पहले ही श्रद्धालुओं को झकझोरा था, अब मंदिर निर्माण से जुड़े दो सबसे प्रभावशाली चेहरे-नृपेंद्र मिश्रा और चंपत राय- ऐसे बयान और दस्तावेज सामने ला रहे हैं कि व्यवस्था की अंदरूनी खींचतान खुलकर दिखाई देने लगी है।
नृपेंद्र मिश्रा ने जून में चंदे के मामले को बेहद गंभीर बताते हुए इसे ‘खुली डवैâती’ बताया था। उन्होंने सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था की गंभीर कमियों की ओर भी इशारा किया था। दूसरी ओर, विशेष जांच दल की रिपोर्ट में चंपत राय की कथित चंदा चोरी में प्रत्यक्ष या परोक्ष संलिप्तता का प्रमाण नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट ने भी जांच को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने और स्थिति रिपोर्ट देने को कहा है। अब चंपत राय ने नौ पन्नों का दस्तावेज जारी कर मानो जिम्मेदारी की पूरी फाइल मेज पर रख दी है। उनका कहना है कि मंदिर निर्माण से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण पैâसला निर्माण समिति की मंजूरी के बिना नहीं होता था और इस समिति में नृपेंद्र मिश्रा की प्रमुख भूमिका थी। यही वह बिंदु है जहां कहानी दिलचस्प हो जाती है।
अगर सब कुछ सामूहिक निर्णय से हुआ, तो फिर गड़बड़ी की जिम्मेदारी केवल नीचे काम करने वाले कर्मचारियों पर वैâसे समाप्त हो सकती है?
नृपेंद्र मिश्रा का अतीत भी इस विवाद को और राजनीतिक बनाता है। १९९० में जब मुलायम सिंह यादव सरकार के दौरान अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चली थी, तब मिश्रा मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव थे। हालांकि मिश्रा स्वयं कह चुके हैं कि ऐसा पैâसला प्रमुख सचिव स्तर का नहीं, मुख्यत: राजनीतिक होता है। बाद में यही अधिकारी पीएम मोदी के प्रमुख सचिव बने और फिर राम मंदिर निर्माण समिति की कमान उन्हें मिली। यही नियुक्ति अब राजनीतिक सवाल खड़े करती है।
राम मंदिर को करोड़ों श्रद्धालुओं ने आस्था से बनाया, पैसा दिया, सोना-चांदी चढ़ाया। ऐसे में जिस व्यवस्था में पारदर्शिता सर्वाधिक होनी चाहिए थी, उसी में चोरी का मामला सामने आया, आठ लोगों की गिरफ्तारी हुई और शीर्ष पदाधिकारियों के इस्तीफे तक हुए।
श्रद्धालुओं का सवाल
राम के नाम पर चंदा उसने दिया था। सुरक्षा आपकी थी। गिनती आपकी थी। निर्णय आपकी समितियों के थे। तो फिर चोरी हुई तो जिम्मेदारी केवल छोटे कर्मचारियों की वैâसे हो गई? यह सवाल चंपत राय बनाम नृपेंद्र मिश्रा से कहीं बड़ा है। श्रेय लेने के समय सब आगे थे- अब जवाबदेही की बारी आई तो आखिर पीछे कौन हट रहा है?

अन्य समाचार