नेपाल पर आई प्राकृतिक आपदाओं की शृंखला थमने का नाम नहीं ले रही है, वहां पर आए महाप्रलय ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली। हजारों घर और परिवार तबाह हो गए। सबसे मुख्य बात यह है कि बारिश न होने के बावजूद यह सारा विनाश हुआ। तिब्बत सीमा में स्थित ल्हेंदे नदी में पहाड़ का एक हिस्सा हिमखंड के साथ ढह गया। उसने नदी के २० किलोमीटर तक के पानी को रोक दिया। वहां एक प्राकृतिक बांध बन गया। बाद में वही बांध टूट गया और वहां रुका हुआ हजारों क्यूसेक पानी महाप्रचंड बहाव बनकर अत्यंत तीव्र गति से भोटेकोशी नदी में आ गया तथा सुनामी की तरह नेपाल में सामने आने वाले हर इलाके, मकानों, इंसानों और मवेशियों को निगलता चला गया। पानी का ऐसा ही एक प्रचंड बहाव त्रिशूली नदी से भी आगे बढ़ा और उसने भी भारी तबाही मचाई। महज कुछ ही मिनटों में यह सब घटित हो गया। मृतकों का सटीक आंकड़ा बता पाना संभव नहीं है, लेकिन इस महाप्रलय में समाए हुए गांवों, मकानों और लापता लोगों की संख्या को देखते हुए यह स्पष्ट है कि मरने वालों की तादाद कहीं अधिक होगी। नेपाल पर आई यह भयानक विपदा भले ही प्राकृतिक हो, लेकिन इसके मूल में आखिरकार इंसान द्वारा किया गया
प्रकृति का विनाश
और पर्यावरण का नुकसान ही है। पिछले कुछ दशकों से पूरी दुनिया में ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ की चेतावनियां और नगाड़े बजाए जा रहे हैं। वायुमंडल में कार्बन गैसों को कम करने की वैश्विक कसमें खाई जा रही हैं। लेकिन वे केवल लफ्फाजी ही साबित हुए, जिससे बढ़ते तापमान का बहुत बड़ा असर पृथ्वी के ‘ग्लेशियरों’ पर पड़ा है। इन्हीं संकटों के बादल हिमालयी पर्वत शृंखलाओं पर भी गहरे मंडरा रहे हैं। हिमालय के ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। तापमान बढ़ने के कारण नए ग्लेशियर नहीं बन रहे हैं और जो मौजूद हैं, वे पिघलते जा रहे हैं। अनगिनत हिमखंड हिमनद नदियों में गिर रहे हैं। गंगोत्री ग्लेशियर जैसी महत्वपूर्ण हिमनदियां भी कुछ वर्षों से पीछे खिसकती जा रही हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण बर्फ पिघलकर हिमालयी पर्वत शृंंखलाओं में हजारों खतरनाक हिमनद झीलें और बांध बन गए हैं। यही हिमनद झीलें और बांध तिब्बत-नेपाल से लेकर भारत के कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों के लिए ‘मौत की लटकती तलवार’ बन चुके हैं। गुरुवार को नेपाल में इन्हीं में से एक तलवार गिरी और
सैकड़ों लोगों की जान
लेकर चली गई। लाखों घरों और संपत्तियों को तबाह कर गई। इस संकट के लिए प्रकृति की ओर उंगली उठाकर इंसान खुद का बचाव नहीं कर सकता। मानव जीवन को सुलभ और सुरक्षित बनाने के लिए विकास आवश्यक है, लेकिन विकास का लालच और उससे इंसान द्वारा मचाई गई प्रकृति की बेलगाम लूट, छेड़छाड़ व तोड़-फोड़ इंसान के अपने ही पैरों पर मारी गई कुल्हाड़ी साबित हो रही है। शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चेतावनियों के बावजूद सरकारें हिमालय की पर्वत शृंंखलाओं पर बुलडोजर चला रही हैं। पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाई जा रही हैं, सुरंगें खोदी जा रही हैं। खतरनाक जलविद्युत परियोजनाएं खड़ी की जा रही हैं। पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलने के कारण इंसान भी जहां संभव हो, जैसे संभव हो, पहाड़ों को तोड़कर इमारतें बना रहा है। सरकार और समाज को आज ये ‘विकास के दूत’ लग रहे हैं। लेकिन यही कल हिमालय के ‘यमदूत’ बनेंगे और सैकड़ों-हजारों लोगों की जान लेंगे, यह बिल्कुल साफ है। हिमालय के तांडव से नेपाल में गुरुवार को आए महाप्रलय ने यही चेतावनी दी है।
