धनुर्धर
सब जानते हैं कि २०१४ में इधर मोदी जी देश के पीएम बने और उधर पूरी दुनिया में देश का डंका बजने लगा था। यह डंका तब से लगातार बजता ही रहा था। इतने में कोई भी थक जाता है भाई! डंका बजाने वालों के हाथ भी आराम मांग रहे हैं। पर मोदी जी का कमिटमेंट देखिए, उन्होंने साफ कर दिया कि आराम हराम है। सॉरी, यह नेहरू जी वाली बात निकल गई मुंह से। आप प्लीज किसी से न कहिएगा कि यह बात पहले नेहरू जी ने कही थी। वैसे कह भी दें तो खास फर्क नहीं पड़ता; उनके लोग इस पर यकीन ही नहीं करेंगे। वे ऐसी किसी भी बात पर यकीन नहीं करते, जो उनके लिए सुविधाजनक न हो।
दो तरह के लोग
असल में मोदी जी इस बात को बहुत पहले ही अच्छी तरह समझ गए थे कि दुनिया में दो ही तरह के लोग होते हैं,जानने वाले और मानने वाले। जानने वाले लोग तो जानने के चक्कर में प्राय: हार्वर्ड वगैरह की ओर निकल जाते हैं। जो किसी कारण नहीं निकल पाते, वे भी निकलने की कोशिश में लगे रहते हैं। सो, किताबों से बाहर झांकने, खासकर धर्म और राष्ट्र का झंडा बुलंद करने में उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती। मुसलमानों की तादाद बढ़ने और हिंदुओं के खतरे में पड़ने का खौफ उन्हें विचलित नहीं करता।
सिर नहीं खपाते
ऐसे लोगों के चक्कर में पड़ने का कोई फायदा नहीं। उनसे जो कुछ भी कहा जाए, वे उसकी चीर-फाड़ में लग जाते हैं और मामले की तह तक पहुंचकर आपको ही समझाने लगते हैं कि आपकी बात कितने प्रतिशत सही है और कितने प्रतिशत गप। गनीमत है कि ऐसे लोग संख्या में ज्यादा नहीं होते। इसलिए उन लोगों को इग्नोर करते हुए मोदी जी ने दूसरी कैटेगरी के लोगों पर, यानी मानने वालों पर फोकस किया। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि अगर आप इन्हें इनकी गलती न बताएं, तो ये किसी भी मामले में ज्यादा सिर नहीं खपाते। आप जो भी कहें, मान लेते हैं।
यूं बजा डंका
मोदी जी ने इन लोगों को इस कदर गोलबंद कर लिया कि वे उनके अलावा किसी और की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं होते। सो, जब मोदी जी ने चाहा, इन्होंने मान लिया कि दुनिया में हमारा डंका बज रहा है। और बज रहा है, तो फिर बज रहा है! जब मोदी जी किसी विदेशी जमीन पर कदम रखें और वहां के राष्ट्राध्यक्ष उनकी किसी बात पर मुस्कुरा भी दें, तो डंके की आवाज और तेज हो जाती।
१८ घंटे की दिहाड़ी
यह सिलसिला एक-दो साल नहीं साहब, पूरे १२ साल से चल रहा है। डंका भी कहने लगा था कि भैया, मुझे अब थोड़ा आराम दो। चाहे जितना भी हराम हो, आराम तो जरूरी हो ही जाता है। बल्कि कहने वालों ने तो यह भी कहा कि भले आदमी, पचहत्तर के हो रहे हो, तुम खुद भी अब थोड़ा आराम लो। लेकिन मोदी जी न तो खुद १८ घंटे की दिहाड़ी से कम पर राजी थे और न ही डंके को राहत देने को तैयार थे।
ट्रंप को आई दया
आखिर उनके ‘डियर फ्रेंड’ ट्रंप को ही डंके पर दया आ गई। सो, उन्होंने ऐसे-ऐसे बयान दिए कि डंका फट गया। अब फटे ढोल से कैसी आवाज निकलेगी? वैसी ही आवाज हो गई है डंके की! यही देखिए कि मोदी जी की सत्ता के जोर पर अपने संगठन का बढ़ा हुआ पुण्य-प्रताप लेकर संघ प्रमुख अमेरिका पहुंचे हुए हैं। और वहां से आवाजें कैसी आ रही हैं? उनके जयकारे की आवाज धीमी पड़ी हुई है!
उल्टा पड़ा दांव
कहां तो संघ अपनी उपलब्धियों का बखान करना चाहता था, कहां ये लोग उसके पापों की फेहरिस्त लेकर बैठ गए हैं। संघ प्रमुख अभी विदेशी धरती पर हैं, सो अपना गुस्सा शालीन मुस्कुराहट के पीछे छुपाए हुए हैं। पर अंदर ही अंदर मन उबल रहा है मोदी जी पर। भई, संघ तो धीरे-धीरे आगे बढ़ने के पक्ष में था; धीमी आंच पर हिंदू राष्ट्र की खिचड़ी पका रहा था। सब कुछ अपने ही हाथों से कर देने का लोभ मोदी जी छोड़ न सके, राम मंदिर से लेकर अनुच्छेद ३७० और कॉमन सिविल कोड तक सब कुछ एक झटके में पूरा करने में लग गए।
इवेंट का तिलस्म
समस्या यह है कि जब आप हर घटना को एक विशाल `मेगा इवेंट’ बनाने के आदी हो जाते हैं, तो आपको हर वक्त एक नए ढोल की जरूरत पड़ती है। टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया के इकोसिस्टम तक, दिन-रात एक ही धुन बजाई जाती है। इस शोर में असली सवाल कहीं खो जाते हैं, चाहे वह महंगाई का मुद्दा हो, बेरोजगारी का आंकड़ा हो या फिर सीमा सुरक्षा की जमीनी हकीकत। सब कुछ बस इसी एक चमक-धमक की ओट में छिपा दिया जाता है। जब तक मंच सजा रहता है और तालियां बजती रहती हैं, तब तक लगता है कि सब कुछ नियंत्रण में है। लेकिन जैसे ही कोई बाहर का व्यक्ति आकर आईना दिखा देता है, पूरे शो की पटकथा गड़बड़ा जाती है और स्क्रिप्ट लिखने वालों के पसीने छूटने लगते हैं।
नैरेटिव का नशा
मानने वालों की जमात की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि वे एक बार जिस नैरेटिव के नशे में आ जाते हैं, उससे बाहर निकलना ही नहीं चाहते। अगर आंकड़े कहें कि अर्थव्यवस्था डांवाडोल है, तो वे आंकड़ों को ही विदेशी साजिश बता देते हैं। अगर कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था रेटिंग गिरा दे, तो उसे देश को बदनाम करने का टूलकिट मान लिया जाता है। सच्चाई चाहे कितनी भी कड़वी होकर सामने खड़ी क्यों न हो, लेकिन इस खास जमात के लिए मोदी जी का मुस्कुराता हुआ चेहरा ही अंतिम सत्य रहता है।
पलट गई गाड़ी
अब ऊबड़-खाबड़, पहाड़ी रास्ते पर इतनी तेज गाड़ी हांकोगे तो गाड़ी तो पलटेगी ही ना! सो, गाड़ी पलट चुकी है। म्यूजिक सिस्टम गड़बड़ा चुका है और उससे बेसुरी आवाज निकल रही है। लेकिन मानने वाले मानने को तैयार नहीं, वे अब भी उसी बेसुरी आवाज को वह डंका मान रहे हैं, जो पूरी दुनिया में बजता हुआ उन्हें प्रतीत हो रहा है।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)
