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अंदर की बात : नेपाल में बांध टूूटा या व्यवस्था की पोल खुली?

राजन पारकर

प्रकृति का प्रकोप अलग, लेकिन सत्ता की तैयारी का हिसाब कौन देगा? नेपाल पर प्रकृति ने कहर बरपाया तो पानी ने किसी से जाति नहीं पूछी, भाषा नहीं पूछी और राजनीति भी नहीं पूछी। घर बह गए, लोग लापता हुए और सैकड़ों परिवारों की जिंदगी देखते ही देखते उजड़ गई। ऐसी परिस्थितियों में सबसे पहले इंसानियत सामने आनी चाहिए, लेकिन राजनीति में हमेशा की तरह सवाल यह भी है कि तैयारी कितनी थी और चेतावनी कब दी गई? तिब्बत क्षेत्र में बांध टूटने की खबर के बाद नेपाल में फिर अलर्ट की चर्चा शुरू हुई। नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की कवायद हो रही है।
बाढ़ में बहता नेपाल, भीड़ में घिरती राजनीति और मराठी पर महायुति की ‘एक साल की’ परीक्षा!
कहीं बांध टूट रहे हैं, कहीं कानून-व्यवस्था की पोल खुल रही है और कहीं भाषा के सवाल पर सत्ता के ही पैâसले पलट रहे है। नेपाल में प्राकृतिक आपदा का कहर, अहिल्यानगर में भाजपा नेता पर भीड़ का कथित हमला और मुंबई में भाषा के सवाल पर सरकार के भीतर निर्णयों का बदलता रुख। ये तीनों घटनाएं अलग-अलग दिखाई देती हैं; लेकिन इनके पीछे सत्ता, प्रशासन और निर्णय क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
नेता की कार टूटी या कानून-व्यवस्था का शीशा?
अहिल्यानगर के नेवासा में भाजपा के जिला उपाध्यक्ष ऋषि शेटे पर कथित हमले की खबर ने राजनीतिक वातावरण गरमा दिया है। समाचारों के अनुसार, बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ ने उन पर हमला किया। उनकी कार में तोड़फोड़ की गई और चाकू से वार किए जाने की भी जानकारी सामने आई है। पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया और कुछ लोगों को हिरासत में लेने की खबर है। अब सवाल सीधा है कि सौ लोग एक आदमी पर टूट पड़ते हैं और पुलिस को बाद में पता चलता है। अगर आरोप सही हैं तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। लोकतंत्र में विरोध करने का अधिकार है। आंदोलन करने का अधिकार है। नारे लगाने का अधिकार है। लेकिन किसी व्यक्ति पर सामूहिक हमला करने का अधिकार संविधान की कौन-सी किताब देती है? यहां राजनीति के गलियारों में एक और चर्चा शुरू हो गई है। क्या स्थानीय राजनीतिक संघर्ष अब सड़क पर शक्ति प्रदर्शन में बदल रहा है? आज भाजपा नेता पर हमला हुआ, कल किसी दूसरे दल के कार्यकर्ता पर हो सकता है। अगर भीड़ को कानून अपने हाथ में लेने की आदत पड़ गई तो फिर थाने, अदालत और संविधान की जरूरत ही क्या रह जाएगी?
मराठी भाषा पर फैसला बदला
सरकार में निर्णय कौन लेता है। मंत्री या ‘मध्यस्थ’ की जरूरत पड़ने वाली राजनीति? मुंबई में भाषा के मुद्दे पर सरकार के भीतर ही एक नया राजनीतिक अध्याय खुलता दिखाई दे रहा है। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए भाषा सीखने के मामले में कड़ा रुख अपनाया। दो महीने की समयसीमा और प्रशिक्षण की व्यवस्था की बात सामने आई, लेकिन फिर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की मध्यस्थता के बाद एक वर्ष की मोहलत दिए जाने की खबर आई, बस! यहीं से राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी शुरू हो गई मंत्री का फैसला था या मंत्रालय का मसौदा? अगर फैसला सही था तो बदला क्यों? और अगर फैसला बदलना ही था तो पहले इतना कड़ा रुख क्यों? महायुति के भीतर सब कुछ ठीक है, ऐसा सार्वजनिक रूप से कहा जाएगा। यह राजनीति का शिष्टाचार है। कुर्सियां हमेशा नाराज नहीं होतीं, कभी-कभी फैसले नाराज होते हैं! मराठी महाराष्ट्र की राजभाषा है। मुंबई में काम करने वाले हर व्यक्ति को स्थानीय भाषा का सम्मान और आवश्यक संवाद सीखना चाहिए। इसमें विवाद की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, लेकिन भाषा के मुद्दे को राजनीतिक तलवार बनाकर इस्तेमाल करना भी उतना ही खतरनाक है।

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