मुख्यपृष्ठस्तंभयहां भी है एक गेटवे ऑफ इंडिया

यहां भी है एक गेटवे ऑफ इंडिया

विमल मिश्र / मुंबई
-मुंबई की तरह सम्मोहित करने वाली जगह भारत में दूसरी नहीं। मुंबई सपनों का शहर है। अजूबों का और अनसुनी कहानियों का।

मुंबई अजूबों का शहर है। इसके दूसरे इलाकों की तरह दक्षिण मुंबई का गांवदेवी इलाका भी कई अजूबों को समाए हुए है। इनमें एक है मुंबई की सबसे बड़ी पहचान गेटवे ऑफ इंडिया का नन्हा रूप।
गांवदेवी इलाके की हरिश्चंद्र गोरेगांवकर मार्ग से लगी भेंडी गली के एक बंगले के अहाते में आपको गेटवे ऑफ इंडिया की छह फुट ऊंची प्रतिकृति देखने को मिल जाएगी, जो मुंबई का सबसे मशहूर स्मारक बनाने वाले रावबहादुर देसाई की व्यक्तिगत संपत्ति है।
जहां सबसे पहले बिजली आई
फोर्ट इलाके का क्रॉफर्ड मार्केट देश का पहला (१८८२) ऐसा इलाका था, जहां के घरों और सड़कों पर बिजली के बल्ब जले। पर जल्दी ही ये बुझ भी गए। कारण, तत्कालीन बॉम्बे म्युनिसिपैलिटी ने जिस ईस्टर्न इलेक्ट्रिक लाइट एंड पॉवर कंपनी से पॉवर सप्लाई का करार किया था, वही अगले ही वर्ष बंद हो गई। १८९४ में अपने ऑफिसों और आस-पास के बाजारों में सप्लाई के लिए म्युनिसिपैलिटी ने बिजलीघर बनाने के लिए अलग से फंड रखा। पर इससे पहले कि सप्लाई ढंग से शुरू हो, बिजली पैदा करने वाली मशीनें ही खराब हो गईं। लाचार, क्रॉफर्ड मार्केट के लोगों को एक बार फिर (१९०६) गैस लाइटिंग की शरण लेनी पड़ गई।
जिनके नाम पर है फुटपाथ
आपने लोगों के नाम पर मोहल्ले, गलियों, सड़कों, यहां तक कि चौक के नाम भी सुने होंगे। पर फुटपाथ का नाम! मरीन ड्रॉइव पर, तारापोरवाला मत्स्यालय के पास मुंबई का एक फुटपाथ ऐसा भी है, जिसे एक व्यक्ति के नाम से जाना जाता है-खोटे फुटपाथ। गिरगांव चौपाटी की सफेद रेत में धंसना हो तो विल्सन कॉलेज के ठीक सामने खोटे फुटपाथ की राह ही जाना होगा। आखिर कौन है वह शख्स, जिसकी स्मृतियों को मुंबई ने अपनी सबसे जानी-पहचानी जगह पर उनका नाम देकर अमर कर दिया है!
अंग्रेजों के जिस जमाने की यह कहानी है उस जमाने में मुंबई के सबसे ताकतवर और सबसे सम्मानित लोगों में से थे खोटे। पूरा नाम रघुनाथ नारायण खोटे। मुंबई महानगरपालिका आज जिन नियमों के तहत शासित है सर फिरोजशाह मेहता के साथ उसके शिल्पकारों में थे खोटे। टाउनहॉल कौंसिल के निरंतर नौ वर्ष सदस्य रहे। महानगरपालिका में मलबार हिल और महालक्ष्मी का प्रतिनिधित्व करते थे। उससे भी पहले, जब नागरिक शासन बेंच ऑफ जस्टिस के तहत होता था, वे जस्टिस ऑफ पीस हुआ करते थे।
‘गो, गो’ यानी घोगा स्ट्रीट
घोगा स्ट्रीट फोर्ट इलाके में जन्मभूमि मार्ग पर एक गली का नाम हुआ करता था। इसके नामकरण की एक मजेदार कहानी है। कहते हैं बीते जमाने के जाने-माने पारसी व्यापारी फरामजी कावसजी बानाजी के पिता कावसजी की इस जगह एक दुकान थी। एक बार यहां आए एक यूरोपियन कारोबारी से कावसजी किसी विवाद को लेकर उलझ पड़े और गुस्से में चिल्ला उठे, ‘गो, गो’, यानी ‘दफा हो जाओ।’ गुस्से में यह यूरोपियन दुकान से बाहर निकल कर खड़ा हो गया और आने-जानेवालों से कहने लगा, ‘डोंट गो टु दिस गो गोज् शॉप।’ बस, उसी दिन से कावसजी का नाम ‘गो गो’ हो गया और इस जगह का घोगा।
नॉट अलाउड
उद्योग-कारोबारी जगत के लीडर, जाने-माने डॉक्टर व एडवोकेट, प्रोफेसर, बड़े सैन्य अधिकारी और कला-संस्कृति जैसे क्षेत्रों की जानी-मानी हस्तियां- शानदार बार व रेस्तरां और एयरकंडीशंड लाइब्रेरी से युक्त सागरतटीय लैंडमार्क रॉयल बॉम्बे यॉट क्लब-एशिया का सबसे पुराना और सबसे शानदार यॉट क्लब है। अपने-आप में एक रुतबा है यहां की मेंबरी।
ब्रिटिश काल की बात। केवल मुंबई ही नहीं, देश भर के सोशल सर्किल में रॉयल बॉम्बे यॉट क्लब का रुआब तब भी ऐसा ही था। शहर के तमाम पॉश क्लबों और होटलों की तरह कोलाबा के यॉट क्लब की मेंबरशिप भी केवल यूरोपियंस तक ही सीमित होती थी। ऐसे में एक रईस पारसी शौकीन ने एक अंग्रेज मोहतरमा से शादी कर इसकी मेंबरशिप हासिल करने की हसरत पाली। क्लब को एक बहुत महंगे बिलियर्ड टेबल की ‘गिफ्ट’ भी दे डाली। पर उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया, जब क्लब ने बेमुतरव्वती से कह दिया, ‘नॉट अलाउड’। याट क्लब के मदिरालय में तो यह प्रतिबंध देश की आजादी के बाद भी कई वर्षों तक कायम रहा। १९५८ में भारतीय मेंबर्स को एंट्री न देने पर विरोध में कार्रवाई हुई, तब जाकर क्लब ने उनके लिए मानद् सदस्यता के द्वार खोले। आज भी यहां ‌सिर्फ आमंत्रण पर ही आया जा सकता है।
मल्टी स्टोरी बिल्डिंग का पुरखा
बाथ से सज्ज भारत की पहली स्टीम चालित लिफ्ट, विशाल बॉलकनी, शानदार डांस फ्लोर, स्विस एंटीरियर, पंखेवालों से बना अनोखा वेंटिलेशन सिस्टम और रेस्त्रां, लॉबी, बॉलरूम व बार में गोरी वेट्रेस। १३० से अधिक कमरों वाले वॉटसन होटल में सब कुछ इंग्लिश था, इंग्लैंड के मौसम के सिवा। यह होटल जिस इमारत का घर बना, एस्प्लेनेड मैंशन कहलाता था। कहते हैं, ताजमहल होटल जमशेदजी टाटा ने जिसे इसलिए बनवाया था क्योंकि उन्हें ‘केवल गोरों के लिए रिजर्व’ इस होटल में घुसने से मन्ाा कर दिया गया था। ‘ एस्प्लेनेड मैंशन बनवाने वाला जॉन हडसन वाटसन नामक गोरा व्यापारी मैंशन बनवाने के लिए सिर्फ इसकी इंटीरियर और सजावट की सारी चीजें ही नहीं, इस्पात के प्रâेम, ईंटें, सीमेंट, टाइल, प्लिंथ व कॉलम बेस तक इंग्लैंड से लाया, बल्कि सिविल इंजीनियर रोलैंड मैसन ऑर्डिश से डिजाइन करवा, १८६४-६५ के बीच पूरी बिल्डिंग ही केप ऑफ गुड होप के रास्ते वहीं से मंगवाए कॉलम्स और ब्रैकेट्स की कास्ट आइरन फिटिंग्ज से खड़ी करा ली। एस्प्लेनेड मैंशन देश की सबसे पुरानी कास्ट आइरन बिल्डिंग ही नहीं, विश्व की पहली ऐसी बहुमंजिली इमारत थी, जिसमें आइरन प्रâेम पर सारा लोड आश्रित था। इसे भारत में आधुनिक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग का पुरखा कह सकते हैं। ल्यूमरे ब्रदर्स की चलती-फिरती पहली फिल्म के प्रदर्शन का स्थान होने के नाते भी एस्प्लेनेड मैंशन की देश के सिनेमा इतिहास में एक खास जगह है! ७ जुलाई, १८९६ को मुंबई में रहने वाले २०० यूरोपियंस और रसूखदार मुंबईकरों ने दो रुपए खर्च करके चलती-फिरती तस्वीरों वाला जो पहला बाइस्कोप देखा, उसका यहां सही ठिकाना एस्प्लेनेड मैंशन में नहीं मालूम। खतरनाक घोषित होने के बाद यह इमारत इन दिनों गहरी मरम्मत के दौर से गुजर रही है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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