सुरेश गोलानी / मुंबई
मीरा-भायंदर महानगरपालिका द्वारा पुलिस आयुक्तालय की जमीन के बदले राज्य सरकार से २० करोड़ से अधिक रकम रुपए वसूलने का मामला अब पूरी तरह से विवादों में घिरता हुआ नजर आ रहा है। सरकारी नियमों को ताक पर रखकर किए गए इस वित्तीय लेन-देन ने अब प्रशासनिक व्यवस्था और पारदर्शिता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। मामला मीरा रोड के प्लेजेंट पार्क इलाके में स्थित पुलिस आयुक्तालय कार्यालय के लिए आरक्षित भूमि (७,३६४ वर्ग मीटर) के हस्तांतरण से जुड़ा है। १९ जनवरी २०२२ को कन्वेयंस डीड के माध्यम से मनपा की ओर से कार्यकारी अभियंता और पुलिस विभाग की तरफ से तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त द्वारा हस्ताक्षरित पंजीकृत दस्तावेजों के अनुसार कुल ११,८१५ वर्ग मीटर क्षेत्र में से ७,३४६ वर्ग मीटर जमीन का सौदा सीधे तौर पर बाजार भाव से २० करोड़ ६ लाख ९२ हजार ७२० रुपए में किया गया। इस पूरे मामले को उजागर करने वाले शिकायतकर्ता धीरज परब ने सवाल उठाया है कि सरकार द्वारा दिसंबर २०२० में अधिसूचित एकीकृत विकास नियंत्रण एवं संवर्धन विनियम (यूडीसीपीआर) की धारा ११.२.१२ के तहत साफ प्रावधान है कि यदि कोई आरक्षित भूमि राज्य सरकार या उसके किसी विभाग (जैसे पुलिस महकमा) को सौंपी जानी है, तो स्थानीय नगर निगम को वह जमीन पूर्णत: मुफ्त हस्तांतरित करनी होगी।
परब ने बताया, ‘पुलिस विभाग सीधे तौर पर राज्य के गृह मंत्रालय के अधीन आता है, ऐसे में जनहित के इस काम के लिए बाजार भाव से पैसे ऐंठना सीधे तौर पर नियमों के उल्लंघन की ओर इशारा करता है, मैंने इसकी शिकायत की है और पुलिस ने मेरा स्टेटमेंट रिकार्ड कर लिया है।’ दूसरी तरफ मनपा का दावा है कि पुलिस आयुक्त कार्यालय के लिए जमीन आरक्षण कर उसे पुलिस को हस्तांतरित करने का निर्णय मनपा की महासभा में हुए पैâसले के अनुसार लिया गया है। महासभा ने जो तय किया था, उसी के अनुसार उक्त जगह का मुआवजा लिया गया है।
मनपा को टीडीआर के बदले मुफ्त में मिली थी जमीन
इस पूरे मामले में सवाल इसलिए भी उठ रहें हैं क्योंकि संबंधित जमीन हासिल करने के लिए मनपा ने खुद एक भी रुपया खर्च नहीं किया था। सूत्रों के अनुसार, मूल भू-स्वामियों को टीडीआर देकर यह जमीन मुफ्त में अपने कब्जे में ली थी। जब मनपा को यह जमीन बिना किसी वित्तीय बोझ के मिली और इसका उपयोग जनता की सुरक्षा के लिए पुलिस आयुक्तालय बनाने में होना था, तो फिर सरकार के ही दूसरे विभाग को इसे बाजार भाव पर क्यों बेचा गया? हालांकि मनपा प्रशासन ने ये भी दावा किया है कि किसी भी सरकारी संस्था को जमीन ट्रांसफर करने हेतु विकास शुल्क, प्रशासनिक लागत और रेडी रेकनर (बाजार मूल्य) से जुड़े कई तकनीकी नियम लागू होते हैं और ली गई राशि उसी मूल्यांकन प्रक्रिया का हिस्सा थी।
