-तौसीफ कुरैशी
तीन तिगाड़ा नहीं, तीन का लोकतंत्र थाष्ठ फिर चुनाव आयोग में यह ‘एकला चलो’ क्यों? अपने यहां कहावत है, तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा। समाज ने यह कहावत शायद इसलिए बनाई होगी कि तीन लोग एक जगह होंगे तो तीन राय होंगी, तीन दिशाएं होंगी और फिर खटपट भी होगी। लेकिन लोकतंत्र ने इसी तीन को अपनी ताकत बनाया। तीन जजों की बेंच इसलिए महत्वपूर्ण होती है कि फैसला किसी एक की मर्जी से नहीं, विचार-विमर्श और बहुमत से हो। संविधान ने भी चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाकर शायद यही संदेश दिया था, एक आदमी चुनाव नहीं कराएगा, संस्था चुनाव कराएगी। लेकिन यह देखो, कैसे पार्टियों को निगल रहा है और लोकतंत्र की सरेआम हत्या कर रहा है। इसका दोषी सुप्रीम कोर्ट भी है। एसआईआर पर छूट देकर उसके हौसले बढ़ गए। आपको याद होगा, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि मुझे अंदर से खबरें मिल रही हैं। वह सही था।
लेकिन आज सवाल यह है कि चुनाव आयोग में तीन लोग हैं तो फैसलों में तीनों की आवाज क्यों नहीं सुनाई दे रही? ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की २३ सितंबर २०२६ की रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के भीतर की ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिस पर देश को ठहरकर सवाल करना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम-से-कम १४ बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।
दोनों ने आरोप लगाया कि कई फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए।
मामला कोई मामूली प्रशासनिक फाइल का नहीं था। मामला मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम काटने-जोड़ने और उस डिजिटल व्यवस्था का था, जिस पर मतदाता सूची का संचालन निर्भर है।
अब जरा ठहरिए। चुनाव आयोग कोई मंत्रालय नहीं है। यह कोई पार्टी कार्यालय भी नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद ३२४ से पैदा हुई वह संस्था है, जिसके भरोसे नागरिक अपना सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अधिकार-वोट-इस्तेमाल करता है। और इसी संस्था के दो सदस्यों को अगर लिखकर यह कहना पड़े कि उन्हें निर्णयों की जानकारी नहीं दी गई, तो सवाल केवल तीन अधिकारियों के बीच की खटपट का नहीं रह जाता। सवाल संस्थागत भरोसे का बन जाता है।
कानून की भाषा भी साफ है। २०२३ के कानून की धारा १८ के अनुसार आयोग का काम यथासंभव सर्वसम्मति से होना चाहिए और अगर मतभेद हो तो बहुमत के आधार पर निर्णय होना चाहिए। यानी तीन का मतलब तीनों की कुर्सियां भर देना नहीं, बल्कि तीन आवाजों वाली संस्था बनाना है।
यही कारण है कि ईसीआईनेट को लेकर उठी आपत्तियां ज्यादा गंभीर दिखाई देती हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण पर सवाल उठाए। उनकी आपत्ति थी कि जमीन पर कानूनन जिम्मेदार निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों की भूमिका कहीं डिजिटल सिस्टम के केंद्रीकृत नियंत्रण से कमजोर न हो जाए।
रिपोर्ट में गोवा के ९७ मतदाताओं का उदाहरण भी दिया गया है, जिनके बारे में बताया गया कि स्थानीय स्तर पर उन्हें योग्य पाए जाने के बावजूद सॉफ्टवेयर के कारण संबंधित निर्णय दर्ज नहीं हो सका।
यहां लोकतंत्र का असली डर किसी एक नाम में नहीं, एक बटन में है। अगर किसी नागरिक का नाम सूची में है या नहीं है, यह तय करने वाली प्रक्रिया इतनी केंद्रीकृत हो जाए कि स्थानीय वैधानिक अधिकारी भी अपने निर्णय को सिस्टम में दर्ज न कर पाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि तकनीक लोकतंत्र की मदद कर रही है या लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपने हिसाब से चलाने लगी है?
और मामला सिर्फ सॉफ्टवेयर का भी नहीं है। फॉर्म-६ में बदलाव को लेकर भी दोनों आयुक्तों ने आपत्ति जताई। रिपोर्ट के अनुसार, नए मतदाताओं से पिछले एसआईआर की मतदाता सूची में अपने या माता-पिता/दादा-दादी के नाम से जुड़ी जानकारी मांगने वाली व्यवस्था पर दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाया और इसे नियमों में संशोधन के बिना किए जाने को अनुचित बताया।
अब सवाल यह नहीं कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने खबर क्यों की। सवाल यह है कि दो चुनाव आयुक्तों ने लिखकर सवाल क्यों उठाए? और उससे भी बड़ा सवाल-उन सवालों का जवाब क्या मिला?
लोकतंत्र में पत्रकार से ज्यादा महत्वपूर्ण खबर कभी-कभी खबर के भीतर छिपा सवाल होता है। यहां खबर यह नहीं कि आयोग में मतभेद है। खबर यह है कि जिस संस्था को देश के चुनावों की निष्पक्षता की गारंटी माना जाता है, उसी के दो सदस्य उसके कामकाज के तरीके पर आपत्ति दर्ज करा रहे हैं।
इसका मतलब साफ हो गया कि इससे अपने-आप २०२४ के चुनाव को कैसे मैनेज किया गया या किसी को सरकार बनाने का फर्जी जनादेश दिया गया, यह अपने आप में सवाल खड़े कर रहा है। इस तरह की खबरों से ऐसा ही निष्कर्ष निकलता भी है।
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की उसी रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि एसआईआर से चुनाव परिणाम प्रभावित होने का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है। लेकिन लोकतंत्र में हर चीज का जवाब चुनाव परिणाम से नहीं दिया जा सकता। चुनाव जीतना एक बात है, चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा दूसरी। जनादेश मतपेटी से आता है, लेकिन उस जनादेश की विश्वसनीयता मतदाता सूची से शुरू होती है, जिसे धीरे-धीरे ज्ञानेश दीमक की तरह चाट रहा है।
इसलिए आज जरूरत किसी को देशद्रोही कहने की नहीं, किसी पत्रकार पर छापा पड़ने की कल्पना करने की भी नहीं और न ही किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में फैसला सुनाने की। जरूरत सिर्फ इतनी है कि चुनाव आयोग स्वयं देश को बताए—किसने क्या फैसला लिया? किसकी मंजूरी थी? किस अधिकारी की पहुंच रोकी गई? ईसीआईनेट में किस स्तर पर नियंत्रण है? दो आयुक्तों की १४ आपत्तियों का क्या हुआ? और अगर तीन सदस्यीय आयोग बनाया गया है तो तीनों की संवैधानिक भूमिका व्यवहार में भी उतनी ही है या नहीं?
क्योंकि लोकतंत्र में तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा नहीं होता। तीन का मतलब होता है—एक की गलती पर दूसरे की नजर, दूसरे की चूक पर तीसरे का सवाल और मतभेद होने पर बहुमत का फैसला। यही तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का सुरक्षा-कवच है। अगर उस कवच में ही दरार दिखाई देने लगे तो सवाल पूछना किसी पार्टी की राजनीति नहीं है। सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है।
और चुनाव आयोग से सवाल पूछना तो इसलिए और जरूरी है, क्योंकि वहां मामला किसी सरकार का नहीं, हर उस नागरिक के वोट का है, जो मानता है कि उसकी एक उंगली पर लगी स्याही सचमुच उसके लोकतांत्रिक अधिकार की गवाही देती है।
लोकतंत्र में कुर्सियां तीन हों और फैसला एकतरफा दिखे, तो सबसे पहले फैसला नहीं, प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए। क्योंकि जनादेश पर भरोसा बचाना है तो चुनाव आयोग को सिर्फ चुनाव कराने वाली संस्था नहीं, विश्वास की संस्था भी बने रहना होगा।
सत्यमेव जयते।
