मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श :मोदी सरकार जनता की ‘दुश्मन' क्यों?

विजय-विमर्श :मोदी सरकार जनता की ‘दुश्मन’ क्यों?

-विजयशंकर चतुर्वेदी
नरेंद्र मोदी के ‘सेंगुल’ की छत्रछाया में भारत की राजधानी दिल्ली ने दुनिया के सामने एक ऐसे नगर की तस्वीर पेश की है, जो अपने ही बाशिंदों के ‘आक्रमण’ से थर-थर कांप रहा है। चप्पे-चप्पे पर बिछे बैरिकेड्स, आवागमन पर सख्त पहरे और हजारों सुरक्षाकर्मियों का अभेद्य घेरा किसी बाहरी दुश्मन के लिए नहीं, बल्कि उन उत्तेजित युवाओं के लिए है जो रोजगार, शिक्षा और अपने भविष्य की जायज मांगों के साथ शांतिपूर्ण विरोध कर रहे हैं।
जब सत्ता युवाओं को बातचीत की मेज पर बुलाने के बजाय लाठी, आंसू गैस और गिरफ्तारियों का जवाब देती है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार का संवाद के प्रति विवेक पूरी तरह मर चुका है। मौजूदा किलेबंदी प्रचंड जन-विरोध से पैदा हुए उस डर का प्रतीक भी है, जिसे मोदी सरकार दुष्प्रचार और दमन के जरिए दबाना चाहती है। युवा अपने जायज अधिकारों की बात कर रहे हैं तो उन्हें देशद्रोही, विदेशी ताकतों या विपक्ष का मोहरा बता दिया जा रहा है। यानी मोदी सरकार की नजर में युवाओं का भविष्य नहीं, सत्ता का ‘कंट्रोल’ मायने रखता है।
नीतिगत विफलता के अंतर्विरोध
मोदी सरकार की राजनीति का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यह है कि वह जनहित का ढोंग तो करती है, लेकिन जनता जब उन्हीं Yसलों पर सवाल उठाती है, तो सरकार उसे शत्रु मानकर टूट पड़ती है। याद ही होगा कि केंद्र सरकार ने अपने अहंकार में कृषि कानून थोप दिए थे, उन्हें ‘क्रांतिकारी सुधार’ बताया गया, और जब किसानों ने विरोध किया तो उन्हें खालिस्तानी, अय्याश और राष्ट्रद्रोही तक कहा गया। महीनों चले दमनचक्र के बाद अंतत: मोदी को घुटने टेकने पड़े थे।
मोदी सरकार का ‘पैटर्न ऑफ गवर्नेंस’ यही है। विपक्ष का गला घोंटकर संसद में मनमाने फैसले करो, फिर उसका विरोध करनेवालों को अपराधी साबित करो और जब आंदोलन नाकाबिले बर्दाश्त हो जाए, तब फैसले से पीछे हट जाओ।
यह सत्ता का अहंकार है, जहां सरकार को लगता है कि उसकी हर बात वेदवाक्य है और सवाल पूछना गुनाह। जो सरकार अपनी जनता को सम्मान देने के बजाय कुचलने में विश्वास करती है, वह लोकतांत्रिक होने का नैतिक अधिकार वैâसे रख सकती है?
संस्थागत क्षरण और पारदर्शिता का मुखौटा
लोकतंत्र की रीढ़ उसकी संस्थाएं होती हैं, लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में संस्थाओं की स्वतंत्रता और स्वायत्तता एक मजाक बनकर रह गई है। चाहे वह जांच एजेंसियां हों, निर्वाचन आयोग हो या न्यायपालिका, हर जगह सरकार का दखल और दबाव स्पष्ट दिखता है। चुनावी बॉन्ड के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के पैâसले ने सरकार की कथित पारदर्शिता की कलई खोलकर रख दी थी, लेकिन फिर भी उस चुनाव पर रोक नहीं लगाई गई। मोदी ने गुप्त चंदे की उस व्यवस्था को वैध ठहराने के लिए क्या कुछ नहीं किया था और फिर जीत चुरा ली।
इस सरकार ने अब तक केवल अपनी सुविधा के अनुसार ही संवैधानिक ढांचे का उपयोग किया है। ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल करते हुए तर्क दिया गया कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन इन्हीं एजेंसियों का उपयोग सरकार के भ्रष्टाचार को ढंकने के लिए कैसे हुआ? संस्थाओं को सरकार की बांह बना देना लोकतंत्र पर सबसे घातक प्रहार है। यह संस्थागत दमन सीधे तौर पर जनता के अधिकारों को छीनने की कोशिश है, जिनके सहारे वह सत्ता को आईना दिखा सकती है।
जनादेश का अहंकार और लोकतंत्र का संकट
मोदी सरकार को यह समझना होगा कि चुनावी जनादेश का मतलब निरंकुश होने का लाइसेंस नहीं होता। किसी भी चुनाव में मिली जीत भविष्य के हर फैसले को सही ठहराने का सर्टिफिकेट नहीं है। जनता ने आपको सेवा करने के लिए चुना था, न कि अपनी ही आवाज को खामोश करने की अनुमति दी थी।
महंगाई, बेरोजगारी और सरकारी नीतियों के प्रति असंतोष पर युवाओं और नागरिकों का सवाल पूछना उनका संवैधानिक हक है। अगर मोदी सरकार को यह लगता है कि वह असंतुष्ट छात्राओं का ‘चीरहरण’ करके लंबे समय तक राज कर सकती है, तो यह उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल है।
सत्ता को असली ताकत नागरिकों की चिंताओं का समाधान करने से मिलती है, लेकिन जिस सरकार को अपनी ही जनता के सवालों से डरकर राजधानी को किले में बदलना पड़े, उसे यह समझ लेना चाहिए कि उसकी सत्ता का नैतिक आधार पूरी तरह से दरक चुका है।
(‘निर्णय का स्थापत्य’ पुस्तक के लेखक, वरिष्ठ पत्रकार, राष्ट्रीय नीति तथा ज्वलंत मुद्दों पर नियमित लेखन करते हैं।)

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