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पटना की पॉलिटिक्स : सत्ता एनडीए की, लेकिन अपनों पर ही लगाम नहीं!

-अरुण कुमार गुप्ता

बिहार में सत्ता की कमान संभाल रहे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सामने चुनौती सिर्फ विपक्ष से मुकाबला करने की नहीं, बल्कि अपने खेमे को एकजुट रखने की भी है। विधान परिषद की आठ सीटों के चुनाव ने गठबंधन के भीतर तालमेल, उम्मीदवारों के समर्थन और नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए यह स्थिति राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। सवाल है क्या सत्ता का नेतृत्व अपने ही खेमे में उठने वाली नाराजगी को नियंत्रित कर पाएगा? चुनावी राजनीति में गठबंधन की ताकत केवल सीटों के गणित से तय नहीं होती। उम्मीदवार तय होने के बाद सहयोगी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं का उन्हें स्वीकार करना भी उतना ही जरूरी होता है। यदि किसी दल के नेता या जनप्रतिनिधि आधिकारिक उम्मीदवार से दूरी बनाते हैं, तो इसका असर चुनावी प्रबंधन पर पड़ सकता है।
बांकीपुर की हार के बाद एमएलसी चुनाव में अग्निपरीक्षा!
सम्राट चौधरी के सामने एनडीए की एकजुटता बचाने की चुनौती
बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने एक बार फिर राजनीतिक नेतृत्व की परीक्षा है। विधान परिषद की आठ सीटों पर २३ अक्टूबर को हो रहे चुनाव में मुकाबला केवल उम्मीदवारों की जीत-हार का नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की एकजुटता का भी है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को लगे झटके के बाद इन चुनावों ने सम्राट चौधरी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। जदयू के भीतर मतभेद और सहयोगी दलों में असंतोष ने गठबंधन की चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार के सामने जन सुराज के अनुज सिंह मैदान में हैं। जदयू विधायक अनंत सिंह ने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन करने के बजाय अनुज सिंह के पक्ष में खुलकर प्रचार किया है। अनंत सिंह का आरोप है कि नीरज कुमार ने पिछले विधानसभा चुनाव में उनके खिलाफ काम किया था। यह विवाद सम्राट चौधरी के लिए इसलिए अहम है, क्योंकि गठबंधन की ताकत केवल सीटों और नेताओं की संख्या से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के साझा प्रयास से तय होती है। जब सत्तारूढ़ दल का विधायक ही आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ खड़ा दिखाई दे, तो नेतृत्व की पकड़ पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मतदाता सूची में ‘फर्जी’ नामों का आरोप
बिहार में विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन सीटों पर मतदान के बीच मतदाता सूची की विश्वसनीयता का सवाल चुनावी बहस के केंद्र में आ गया है। पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सूची में कथित फर्जी प्रविष्टियों और पात्र शिक्षकों के नाम छूटने की शिकायतों ने चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जब चुनाव शिक्षकों जैसे सीमित और विशेष मतदाता वर्ग के बीच हो रहा हो, तब सूची में एक-एक नाम का महत्व बढ़ जाता है। सवाल है, मतदाता सूची तैयार करने और उसकी जांच करने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की थी, उन्होंने आपत्तियों पर कितनी गंभीरता से कार्रवाई की? रिपोर्ट के मुताबिक, पटना साइंस कॉलेज ने अपनी ओर से दर्ज मतदाताओं में पांच ऐसे नामों पर सवाल उठाए, जिनके कॉलेज के कर्मचारी होने की पुष्टि नहीं हुई। कॉलेज ने यह भी बताया कि उसके तीन वास्तविक शिक्षकों के नाम सूची से गायब थे। पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में पटना, नालंदा और नवादा जिले शामिल हैं और कुल ११,७१९ पंजीकृत मतदाता हैं। यह मामला केवल नामों की गलती तक सीमित नहीं है।

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