शीतल अवस्थी
धार्मिक परंपरा में घी से शिवाभिषेक संतान-सुख, वंशवृद्धि, पारिवारिक समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना से किया जाता है। इसका उद्देश्य भगवान शिव और माता पार्वती से परिवार के कल्याण का आशीर्वाद मांगना है; इसे चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
भगवान शिव और माता पार्वती का परिवार भारतीय संस्कृति में प्रेम, संतुलन और पारिवारिक एकता का आदर्श माना गया है। गणेश और कार्तिकेय के माता-पिता के रूप में शिव-पार्वती की संयुक्त उपासना संतान-सुख और कुलवृद्धि की कामना से की जाती है। धार्मिक मान्यताओं में शिवलिंग पर घी की धारा अर्पित करना इसी उपासना का एक विशेष स्वरूप है।
घी को सात्त्विकता, तेज, पोषण और यज्ञ का प्रमुख द्रव्य माना गया है। पूजा में जलने वाला घी का दीपक ज्ञान और शुभता का प्रतीक है। शिवाभिषेक में घी अर्पित करते समय भक्त अपने परिवार की उन्नति, भावी पीढ़ियों के सदाचार और वंश की प्रतिष्ठा बनाए रखने की प्रार्थना करता है।
कुलवृद्धि का व्यापक अर्थ
कुलवृद्धि को केवल संतान-जन्म तक सीमित नहीं समझना चाहिए। परिवार में प्रेम, स्वास्थ्य, सदाचार, शिक्षा, संस्कार और परस्पर सहयोग बढ़ना भी कुल की उन्नति है। संतान तभी कुल का गौरव बढ़ाती है, जब उसे करुणा, सत्य, सेवा और जिम्मेदारी के संस्कार दिए जाएं।
इसलिए घी से शिवाभिषेक करते समय केवल संतान प्राप्ति नहीं, बल्कि स्वस्थ, विवेकशील और संस्कारवान संतति की कामना करनी चाहिए। जिन दंपतियों की पहले से संतान है, वे उसके स्वास्थ्य, शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए भी यह पूजा कर सकते हैं।
घी का धार्मिक महत्त्व
वैदिक यज्ञों में घी की आहुति का विशेष स्थान है। इसे अग्नि के माध्यम से देवताओं तक संकल्प पहुंचाने वाला पवित्र द्रव्य माना गया है। घी पोषण और तेज का भी प्रतीक है। भगवान शिव पर घी अर्पित करने का भाव है कि परिवार का जीवन स्वास्थ्य, ऊर्जा और सात्त्विकता से भरपूर हो।
घी की स्निग्धता संबंधों में प्रेम और सहजता बनाए रखने का संकेत देती है। जिस परिवार में कटुता, अहंकार और संवादहीनता हो, वहां केवल संतान का जन्म कुलवृद्धि को सार्थक नहीं बना सकता। सच्ची कुलवृद्धि परिवार के सदस्यों के बीच विश्वास और आत्मीयता बढ़ने से होती है।
घी से शिवाभिषेक की सरल विधि
सोमवार, प्रदोष, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि अथवा सावन में यह अभिषेक किया जा सकता है। संतान-सुख की कामना रखने वाले दंपति संभव हो तो साथ बैठकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करें।
प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा-स्थान पर शिवलिंग के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय का स्मरण करें। सबसे पहले शिवलिंग पर स्वच्छ जल अर्पित करें। इसके बाद थोड़े शुद्ध घी में हल्का गुनगुना जल मिलाकर पतली धारा से शिवलिंग का प्रतीकात्मक अभिषेक करें।
अभिषेक के समय पंचाक्षरी मंत्र का जप करें-
ॐ नमः शिवाय।
संतान और परिवार के कल्याण की प्रार्थना के साथ यह मंत्र भी पढ़ा जा सकता है—
देवदेव महादेव पार्वतीप्रिय शंकर।
इष्टं मे सफलं कुरु कृपां कुरु महेश्वर॥
अभिषेक के बाद शिवलिंग को पहले गुनगुने और फिर सामान्य स्वच्छ जल से अच्छी तरह धोएं, ताकि घी चिपका न रहे। इसके बाद चंदन, अक्षत, बेलपत्र, पुष्प और फल अर्पित करें।
शिव-पार्वती से संयुक्त प्रार्थना
कुलवृद्धि की कामना में माता पार्वती की पूजा भी आवश्यक मानी जाती है। पूजा के अंत में पति-पत्नी मिलकर प्रार्थना कर सकते हैं-
‘हे शिव-पार्वती! हमारे परिवार में प्रेम, स्वास्थ्य और धर्म की वृद्धि करें। हमें योग्य संतान का सुख तथा उसके पालन-पोषण के लिए विवेक, धैर्य और सामर्थ्य प्रदान करें।’ङ
पूजा में भगवान गणेश का स्मरण विघ्नों की शांति और कार्तिकेय का स्मरण तेजस्वी तथा साहसी संतति की कामना से किया जाता है।
कितने घी का प्रयोग करें?
अभिषेक के लिए बड़ी मात्रा में घी बहाना आवश्यक नहीं है। कुछ चम्मच घी से प्रतीकात्मक अभिषेक पर्याप्त है। अधिक घी चढ़ाने से विशेष फल मिलता है—ऐसा कोई अनिवार्य धार्मिक नियम नहीं है। भगवान शिव भाव के भूखे माने गए हैं, सामग्री की मात्रा के नहीं।
घी को सीधे नाली या जलस्रोत में बहाना पर्यावरण और स्वच्छता दोनों के लिए उचित नहीं है। घर अथवा मंदिर में अभिषेक करते समय निकासी की व्यवस्था का ध्यान रखें। शेष शुद्ध घी का उपयोग दीपक जलाने, भोजन बनाने या किसी जरूरतमंद परिवार को देने में किया जा सकता है।
संतान संबंधी समस्या में चिकित्सा भी आवश्यक
संतान प्राप्ति में विलंब के अनेक चिकित्सकीय कारण हो सकते हैं, जो महिला, पुरुष अथवा दोनों से संबंधित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में दोषारोपण करने के बजाय योग्य स्त्रीरोग विशेषज्ञ या प्रजनन विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। आवश्यक जांच और उपचार को पूजा के कारण टालना उचित नहीं है।
घी से शिवाभिषेक मन को शांति, दंपति को भावनात्मक सहारा और सकारात्मक संकल्प दे सकता है, लेकिन यह बांझपन अथवा किसी प्रजनन-संबंधी रोग का प्रमाणित उपचार नहीं है। आस्था और चिकित्सा एक-दूसरे की विरोधी नहीं; दोनों अपनी-अपनी भूमिका निभा सकती हैं।
कुल की सच्ची उन्नति
संतान के जन्म के साथ माता-पिता की जिम्मेदारी आरंभ होती है। उसे अच्छा भोजन, शिक्षा, सुरक्षा और नैतिक संस्कार देना सबसे बड़ी कुल-पूजा है। बेटा और बेटी दोनों समान रूप से कुल की वृद्धि और गौरव के अधिकारी हैं। केवल पुत्र को वंशवृद्धि का माध्यम मानना वर्तमान सामाजिक और मानवीय दृष्टि से उचित नहीं है।
घी की धारा से शिवाभिषेक का वास्तविक संदेश है-परिवार में प्रेम की स्निग्धता, ज्ञान का प्रकाश और संस्कारों की निरंतरता बनाए रखना। जिस कुल में स्त्री का सम्मान, बच्चों की सुरक्षा, बुजुर्गों की सेवा और जरूरतमंदों की सहायता होती है, वही कुल भगवान शिव की कृपा का वास्तविक पात्र बनता है।
