मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव : ‘हर-हर रेखा, घर-घर ठेका!’

दिल्ली लाइव : ‘हर-हर रेखा, घर-घर ठेका!’

-अरुण कुमार गुप्ता

दिल्ली में ऑनलाइन शराब बुकिंग ऐप को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए ऐप की सुविधा वापस लेने के लिए २४ घंटे का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि मांग नहीं मानी गई तो सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन शुरू किया जाएगा। भारद्वाज ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि दिल्ली में मरीजों को डायलिसिस के बाद दवाओं के लिए कतारों में खड़ा होना पड़ता है। महिलाओं को बस यात्रा से जुड़ी सुविधाओं के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ता है और एसआईआर के दौरान मतदाता सूची में नाम से संबंधित काम कराने के लिए भी लोगों को दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसे में शराब की बुकिंग को सुविधाजनक बनाने के लिए व्यवस्था सक्रिय होने पर उन्होंने सवाल उठाए। आप नेता ने इस नीति पर तंज कसते हुए इसे ‘हर-हर रेखा, घर-घर ठेका’ करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की प्राथमिकताएं आम लोगों की जरूरतों के बजाय शराब उपभोक्ताओं की सुविधा पर केंद्रित दिखाई दे रही हैं।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का ‘जन-अभियोग’
लोकतंत्र में मतदाता का नाम ही उसकी राजनीतिक ताकत है। लेकिन जब उसी नाम को लेकर सवाल उठने लगें, तो विवाद सिर्फ मतदाता सूची तक सीमित नहीं रहता, बल्कि चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही तक पहुंच जाता है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर दिल्ली में यही सियासी टकराव तेज होता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला इंडिया गठबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उनके खिलाफ ‘जन-अभियोग’ जैसे प्रतीकात्मक कार्यक्रम और १ नवंबर को बड़ी रैली की तैयारी कर रहा है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं है। उसकी मांग है कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उन्हें स्पष्ट जानकारी मिले, आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिले और हर शिकायत का निष्पक्ष निपटारा हो। सवाल सीधा है अगर किसी पात्र नागरिक का नाम सूची से हटता है, तो उसे अपना लोकतांत्रिक अधिकार बचाने के लिए दफ्तरों के चक्कर क्यों लगाने पड़ें? और यदि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है, तो उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब देने में हर्ज क्या है? मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्तावित ‘जन-अभियोग’ कार्यक्रम के जरिए विपक्ष चुनाव आयोग पर राजनीतिक दबाव बढ़ाना चाहता है। १ नवंबर की प्रस्तावित रैली को भी इसी अभियान का अहम हिस्सा माना जा रहा है। यह केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे को लेकर चल रही लड़ाई का प्रतीक बन सकता है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। उस पर सवाल उठें तो उन्हें केवल राजनीतिक विरोध कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जहां मतदाता को अपने नाम, अपने वोट और अपनी पात्रता को लेकर अनिश्चितता न झेलनी पड़े।

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