मुख्यपृष्ठनए समाचारआयुक्त का अड़ियल रवैया पड़ा भारी, हाई कोर्ट ने लगाई फटकार!

आयुक्त का अड़ियल रवैया पड़ा भारी, हाई कोर्ट ने लगाई फटकार!

-एनओसी की शर्त पर अटका था निर्माण अनुमति का आवेदन, अदालत ने दिए थे तत्काल मंजूरी के निर्देश
-अवमानना याचिका के बाद हरकत में आया मनपा प्रशासन, कोर्ट ने दी अंतिम चेतावनी
सुरेश गोलानी / मुंबई
उच्च न्यायालय ने मीरा-भायंदर महानगरपालिका के आयुक्त राधाबिनोद शर्मा के अड़ियल रवैये पर तीव्र आक्रोश व्यक्त किया है। अदालत ने कमिश्नर को दंड देने से तो इनकार कर दिया, लेकिन उन्हें भविष्य के लिए अंतिम चेतावनी देते हुए कड़ी हिदायत दी है। सालासर यूनिक रियल्टर्स एलएलपी की अवमानना याचिका (संख्या ६०९/२०२६) पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम वी. सिरसाट की खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट के आदेशों के क्रियान्वयन में टालमटोल करना उच्च पदस्थ लोक सेवकों की दुर्भावनापूर्ण मानसिकता को दर्शाता है। कोर्ट ने पूर्व में आदेश दिया था कि ठाणे कलेक्टर से किसी भी एनओसी की मांग किए बिना याचिकाकर्ता के निर्माण परमिशन के आवेदन को तुरंत मंजूर किया जाए। इस स्पष्ट निर्देश के बावजूद, मनपा कमिश्नर ने ठाणे कलेक्टर को चिट्ठी लिखकर हाई कोर्ट के पैâसले को ही चुनौती देने की सलाह देने का आरोप है। याचिकाकर्ता ने इस आचरण पर आयुक्त और संबंधित अधिकारियों को कड़ी सजा देने की गुहार लगाई थी। हालांकि, खंडपीठ ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की कि ‘हम इस हरकत के लिए दंडित नहीं कर रहे हैं, क्योंकि ऐसा करना मनपा के इस बचकाने आचरण को जरूरत से ज्यादा महत्व देना होगा।’
क्या है पूरा मामला
सालासर यूनिक रियल्टर्स एलएलपी ने अपनी एक संपत्ति के विकास के लिए ९ जुलाई २०२४ को मनपा के समक्ष प्लानिंग परमिशन के लिए आवेदन किया था। हालांकि, मनपा अधिकारियों ने राजस्व अधिकारियों और ठाणे के कलेक्टर से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लाने की शर्त रखकर इस प्रक्रिया को अटका दिया था। इसके खिलाफ डेवलपर ने हाई कोर्ट में रिट याचिका (संख्या ८६१० /२०२५ ) दायर कर दी। १३ मार्च २०२६ को जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम वी. सिरसाट की खंडपीठ ने मनपा के अड़ंगे को खारिज करते हुए साफ आदेश दिया कि कलेक्टर या राजस्व विभाग की किसी भी एनओसी का इंतजार किए बिना याचिकाकर्ता के आवेदन को ‘तुरंत’ मंजूर किया जाए। कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद, मनपा ने उस पर अमल करने के बजाय १८ जून २०२६ को जिलाधिकारी ठाणे को एक पत्र भेज दिया, जिसमें अजीबोगरीब रुख अपनाते हुए कलेक्टर को ही सुझाव दे डाला कि वे कोर्ट के इस आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती दें। जब डेवलपर को प्रशासनिक टालमटोल की भनक लगी, तो उन्होंने कोर्ट के आदेश की ‘जानबूझकर की गई अवज्ञा’ के खिलाफ अवमानना याचिका दायर कर दी।
आखिरकार, अवमानना याचिका दायर होने के डर से घबराए अफसरों ने आनन-फानन में २४ घंटे पहले ही नोटिस जारी कर काम शुरू किया था, जिसके कारण कोर्ट ने केस बंद कर दिया।
पहले भी वीडियो कॉन्फ्रेसिंग पर आयुक्त को मांगनी पड़ी थी माफी
बता दें कि यह पहला मौका नहीं है जब आयुक्त का रवैया न्यायिक जांच के घेरे में आया है। इससे दो महीने पहले, २१ अगस्त २०२६ को ‘ग्रैंडबिल्ड लैंड डेवलपर्स’ के एक अन्य मामले में भी अदालत के स्थगन आदेश के बावजूद, एक स्थानीय विधायक के कथित राजनीतिक दबाव में आकर मनपा ने निर्माण कार्य रुकवा दिया था। उस समय तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने इसे ‘जानबूझकर की गई गंभीर अवज्ञा’ माना था, जिसके बाद आयुक्त को वीडियो कॉन्प्रâेंसिंग के जरिए कोर्ट से माफी मांगते हुए अपना आदेश वापस लिया था।

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