-वाह रे महंगाई! अब तक तू गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की रसोई में आग लगा रही थी, अब सीधे मंत्री जी की थाली तक पहुंच गई
सामना संवाददाता / मुंबई
कहते हैं कि महंगाई का दर्द वही समझता है, जिसकी जेब से पैसा निकलता है। अब तक आम आदमी पेट्रोल, गैस, सब्जी और राशन के बिल देखकर माथा पीट रहा था। लेकिन लगता है कि महंगाई की असली अनुभूति कराने के लिए स्विगी का बिल भी जरूरी हो गया है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जी को जब ऑनलाइन सामान मंगाने पर कीमतें कुछ ज्यादा लगीं, तो उन्होंने भी अपना अनुभव साझा कर दिया। अब मंत्री जी ने सलाह भी दे दी कि प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तो कीमतें घटेंगी। बिलकुल सही, लेकिन सवाल यह है कि आम आदमी कब तक इस प्रतिस्पर्धा का इंतजार करे? उसकी थाली में महंगाई रोज परोसी जा रही है। कभी टमाटर रुलाता है, कभी दाल भाव खाती है और कभी गैस सिलिंडर बजट का बाजा बजा देता है। गडकरी जी, आम आदमी को तो स्विगी पर खाना मंगाने से पहले दस बार सोचना पड़ता है। कई बार खाने की कीमत से ज्यादा तो सुविधा शुल्क, प्लेटफॉर्म फीस और डिलिवरी चार्ज देखकर भूख मर जाती है। वैसे मंत्री जी का अनुभव साझा करना भी कम बड़ी बात नहीं। कम से कम अब महंगाई की चर्चा सिर्फ विपक्ष के भाषणों तक सीमित नहीं रही।
