सैयद सलमान, मुंबई
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत को घेरने की कोशिशें नई नहीं हैं। हाल के दिनों में ‘जिहादवॉच’ जैसी वेबसाइटों के हवाले से आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान का प्रतिष्ठान डिजिटल माध्यमों से भारतीय मुसलमानों के बीच असंतोष भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। आरोप है कि भारत में मुसलमानों के कथित उत्पीड़न को लेकर ऐसा नैरेटिव तैयार किया जा रहा है, जिसका मकसद उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था से विमुख करना और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को फिर से प्रासंगिक बनाना है।
चिंता निजी हित की!
इस दावे की पोल खोलना बेहद जरूरी है। बहस का एक अहम पहलू यह भी है कि विदेशी ताकतें भारतीय मुसलमानों को किस नजर से देखती हैं। क्या उन्हें लगता है कि भारत का मुसलमान अपनी राजनीतिक समझ और राष्ट्रीय पहचान के प्रति इतना असमर्थ है कि किसी बाहरी प्रचार से उसका नजरिया बदल जाएगा? भारतीय समाज की वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
तुर्की और पाकिस्तान की दिलचस्पी को उनके राजनीतिक हितों के संदर्भ में समझना होगा। एर्दोगन लंबे समय से इस्लामी दुनिया में तुर्की की नेतृत्वकारी भूमिका यानी खिलाफत स्थापित करने की कोशिश करते रहे हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान की राजनीति में भारत-विरोध एक पुराना और सुविधाजनक मुद्दा रहा है। आर्थिक चुनौतियों, राजनीतिक खींचतान और अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बीच भारत को लेकर आक्रामक बयानबाजी उनके नेतृत्व के लिए राजनीतिक लाभ का माध्यम भी बनती है। ऐसे में भारतीय मुसलमानों के नाम पर जताई जा रही सहानुभूति के पीछे मानवीय चिंता से अधिक भू-राजनीतिक हित होने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पाकिस्तान की ओर से धर्म के आधार पर राजनीतिक निष्ठा तय करने की कोशिश इतिहास के उस अध्याय को भुलाने जैसी है, जिसमें भारतीय मुसलमानों ने अपनी अलग राह चुनी थी। १९४७ में विभाजन के बावजूद बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भारत में रहना स्वीकार किया। यह पैâसला सिर्फ जमीन या घर से जुड़ा नहीं था। इसके पीछे साझा इतिहास, सामाजिक रिश्ते, सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक देश में बराबरी के नागरिक के रूप में जीने का विश्वास था। मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेताओं ने जिस समावेशी राष्ट्रवाद की पैरवी की, उसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
अपने गिरेबान में झांके
भारतीय मुसलमानों की पहचान किसी विदेशी सत्ता या धार्मिक नेतृत्व की मोहताज नहीं है। उनकी भाषा, खानपान, संगीत, साहित्य और सामाजिक परंपराओं में इस देश की सदियों पुरानी साझी विरासत दिखाई देती है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक उनका जीवन भारतीय समाज से गहराई तक जुड़ा है। इसे किसी अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान के प्रभाव में बदल देने की कल्पना भारतीय समाज की पहचान को न समझ पाने का नतीजा है।
इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय मुसलमानों के सामने कोई समस्या नहीं है। सांप्रदायिक तनाव, भेदभाव, राजनीतिक उपेक्षा और सुरक्षा से जुड़े सवालों पर उनकी चिंताएं वास्तविक हैं। इन मुद्दों को उठाना देशविरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इनका इस्तेमाल कर पूरे मुस्लिम समाज को भारत के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश भी उतनी ही अनुचित है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और देश के प्रति निष्ठा एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते।
ऐसे में भारतीय मुसलमानों के अधिकारों की चिंता जताने वाले देशों को पहले अपने भीतर झांकना चाहिए। पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति और ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। तुर्की में भी राजनीतिक विरोध और नागरिक स्वतंत्रता को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होती रही है। ऐसे देशों के राजनीतिक नेतृत्व को भारतीय मुसलमानों का नैतिक संरक्षक बनने से पहले अपने रिकॉर्ड का जवाब देना चाहिए।
बराबर की हिस्सेदारी
भारतीय मुसलमान समझते हैं कि उनके अधिकारों का आधार किसी विदेशी राष्ट्रपति का भाषण या पड़ोसी देश का राजनीतिक एजेंडा नहीं है। उनकी नागरिकता, स्वतंत्रता और समानता की गारंटी भारतीय संविधान देता है। न्यायपालिका, लोकतांत्रिक संस्थाएं और नागरिक समाज इस व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। इनसे जवाब मांगना और सुधार की अपेक्षा करना भी संवैधानिक विश्वास का हिस्सा है।
विदेशी दुष्प्रचार का मुकाबला सिर्फ राष्ट्रवाद के नारों से नहीं किया जा सकता। इसके लिए तथ्यपरक संवाद, पारदर्शिता और सामाजिक विश्वास जरूरी हैं। भारतीय राजनीतिक नेतृत्व को भी समझना होगा कि सामाजिक समानता और सुरक्षा की भावना जितनी मजबूत होगी, बाहरी ताकतों के लिए अविश्वास फैलाना उतना ही कठिन होगा।
भारतीय मुसलमानों को किसी विदेशी सत्ता के सामने अपनी निष्ठा साबित करने की जरूरत नहीं है। उनका राष्ट्रप्रेम किसी राजनीतिक दल की स्वीकृति या बाहरी देश के प्रमाणपत्र पर निर्भर नहीं करता। वे भारत के नागरिक हैं, इस देश के इतिहास और वर्तमान का हिस्सा हैं और इसके भविष्य में भी उनकी बराबर की हिस्सेदारी है। तुर्की हो, पाकिस्तान हो या कोई अन्य देश, किसी को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि भारतीय मुसलमान किसके साथ खड़े होंगे। यह पैâसला वे बहुत पहले कर चुके हैं।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)
