ई राज
‘अगर यह राज बाहर आया, हैमिल्टन, तो तुम्हारी सियासत और शराफत दोनों का जनाजा निकल जाएगा!’ अंधेरी, तूफानी रात में उठी यह धमकी भरी आवाज किसी और की नहीं, बल्कि जेम्स रेनॉल्ड्स की थी। अमेरिका के पहले ट्रेजरी सेक्रेटरी यानी खजांची और एलेक्जेंडर हैमिल्टन की साख दांव पर लगी थी। वजह? एक ऐसा हुस्न का जाल, जिसमें देश का सबसे समझदार दिमाग पूरी तरह उलझ चुका था!
कहानी की शुरुआत हुई थी उस दिन, जब मैरिया रेनॉल्ड्स रोती हुई हैमिल्टन के दफ्तर पहुंची। बिखरी हुई जुल्फें, आंखों में आंसुओं का सैलाब और एक मासूम गुहार, ‘मेरे पति मुझे छोड़कर चले गए हैं, मुझे मदद चाहिए!’ हैमिल्टन का दिल पसीज गया। लेकिन उन्हें क्या पता था कि मदद का यह सिलसिला जल्द ही बंद कमरों की रूह कंपा देने वाली गुपचुप मुलाकातों में बदलने वाला था।
दोनों शादीशुदा थे। हैमिल्टन का नाम देश के सबसे सम्मानीय लीडरान में शुमार था, लेकिन मैरिया की बाहों में जाते ही कानून, राजनीति और नैतिकता के सारे पाठ धरे के धरे रह जाते। इश्क का यह खुमार इतना गहरा था कि हैमिल्टन अपनी ही बनाई मर्यादाओं को आग लगा बैठे।
लेकिन इस हसीन गुनाह के पीछे
छिपा था एक भयानक षड्यंत्र!
दरअसल, मैरिया का पति जेम्स कोई पीड़ित नहीं, बल्कि एक शातिर ब्लैकमेलर था। उसने इस आशिकी को हैमिल्टन से मोटी रकम ऐंठने का जरिया बना लिया। अपनी इज्जत और सियासी करियर को बचाने के लिए हैमिल्टन चुपचाप नोटों की गड्डियां उसकी तरफ उछालते रहे।
फिर आया साल १७९७! पत्रकार जेम्स वैâलेंडर ने इस गंदे खेल का पर्दाफाश कर दिया। रातों-रात हैमिल्टन का ‘मासूमियत’ का नकाब उतर गया। देश स्तब्ध था! अपनी आबरू बचाने के लिए हैमिल्टन ने वो किया जो इतिहास में कम ही देखा गया। उन्होंने खुलेआम अपनी बदनामी कबूल करते हुए लिखा,
‘यह इकरारनामा बिना शर्मिंदगी के नहीं लिखा जा रहा… मैं उस सीने को पहुंचाए दर्द के लिए खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा, जो मेरी पूरी वफादारी और प्यार का हकदार था।’
सियासत, हवस, ब्लैकमेलिंग और फिर भरे बाजार में जुर्म-ए-इश्क का कबूलनामा! हैमिल्टन की यह रोमांटिक दास्तान इतिहास का वो काला पन्ना बन गई, जिसकी गूंज आज भी अमेरिका के गलियारों में सुनाई देती है!
