-सैयद सलमान मुंबई
अदालतों के कई फैसले कागजों में दर्ज होकर रह जाते हैं, लेकिन कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो सदियों से चली आ रही सामाजिक जकड़नों की खिड़कियां खोल देते हैं। केरल उच्च न्यायालय का नया फैसला कुछ ऐसा ही है, जिसमें साफ कहा गया कि मुस्लिम महिला को ‘खुला’ के जरिए निकाह खत्म करने के लिए अपने शौहर की मर्जी या इजाजत की दरकार नहीं है। यह महज एक कानूनी फैसला भर नहीं है, बल्कि उस गैर-बराबरी पर सीधी चोट है जो लंबे अरसे से मजहब की आड़ में औरतों पर थोपी जाती रही है। अदालत ने १९७२ के उस पुराने ढर्रे को एक झटके में खारिज कर दिया, जिसने खुला को शौहर की दया का मोहताज बना रखा था।
वीटो पावर शौहर!
अगर ठंडे दिमाग से समझा जाए, तो इस्लाम में निकाह कोई ऐसा अटूट या जन्म-जन्मांतर का बंधन नहीं है, जिसे तोड़ना गुनाह समझा जाए। यह दो बालिग इंसानों के बीच की एक सुलझी हुई सिविल संविदा यानी दीवानी अनुबंध है। अब सीधी सी बात है, जिस समझौते में दोनों अपनी मर्जी से दाखिल होते हैं, उससे बाहर निकलने का रास्ता भी तो दोनों के लिए बराबरी का होना चाहिए। विडंबना देखिए कि समाज ने मर्द के ‘तलाक’ देने के हक को तो बेरोकटोक मान लिया, लेकिन जब बात औरत के अलग होने यानी ‘खुला’ की आई, तो उस पर बंदिशों का ऐसा ताना-बाना बुन दिया गया कि वह खुद को एक बेबस कैदी की तरह महसूस करने लगी।
अगर कोई मजहब की मूल किताबों और रिवायतों को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़े, तो यह बात शीशे की तरह साफ हो जाती है। पवित्र क़ुरआन की एक आयत (२:२२९) को ही ले लीजिए। वहां साफ लफ्जों में इशारा है कि अगर दोनों को अंदेशा हो कि वे अल्लाह की बनाई हदों में रहकर रिश्ते का निबाह नहीं कर पाएंगे तो औरत अपनी मेहर वगैरह लौटाकर खुद को उस रिश्ते से आजाद करा सकती है। इसमें किसी पर कोई गुनाह नहीं है। गौर करनेवाली बात यह है कि इस पूरी हिदायत में कहीं भी शौहर की मंजूरी या उसके वीटो पावर का जिक्र तक नहीं है।
इसकी सबसे खूबसूरत और पुख्ता मिसाल खुद पैगंबर मोहम्मद साहब के दौर से मिलती है। सहीह बुखारी में दर्ज एक वाकया आंखें खोल देने वाला है। साबित बिन वैâस की बीवी जमीला पैगंबर साहब के पास पहुंचीं। उन्होंने अपने शौहर के किरदार या दीनो-ईमान पर कोई उंगली नहीं उठाई, कोई बुराई नहीं की। उन्होंने बस इतनी सी बात सादगी से कही कि उनके दिल में शौहर के लिए वह जज्बा नहीं रहा, जो एक निकाह में या वैवाहिक जीवन में होना चाहिए और वे डरती हैं कि कहीं इस बेदिली में उनसे कोई नाफरमानी न हो जाए। पैगंबर साहब ने उनसे कोई तल्ख सवाल नहीं किया, न ही उन्हें जबरन समझौता करने की नसीहत दी। उन्होंने सिर्फ इतना पूछा कि क्या निकाह में तोहफे के तौर पर मिला बाग वे लौटा सकती हैं? जब उन्होंने रजामंदी दी तो पैगंबर साहब ने साबित से कहा कि वे बाग वापस ले लें और उन्हें आजाद कर दें। न शौहर की ना-नुकुर सुनी गई, न औरत से कोई वजह पूछी गई। सिर्फ दिली नापसंदगी ही रिश्ते से अलग होने की पूरी बुनियाद बन गई।
अंधेरे में रोशनी
मगर अफसोस कि जैसे-जैसे वक्त गुजरा, मर्दवादी सोच और पुरुष प्रधान समाज ने इस फैयाज हक को अपनी सहूलियत के सांचे में ढाल दिया। समाज में यह गलतफहमी गहरी कर दी गई कि जब तक शौहर ‘हां’ न कहे, तब तक खुला मुमकिन ही नहीं। नतीजा यह हुआ कि काजियों के चक्करों और अदालतों की लंबी तारीखों में औरतें पिसती रहीं। कई बार तो ऐसे रिश्ते को ढोने की मजबूरी बन गई, जहां न प्यार बचा था, न इज्जत; बस घुटन बाकी थी।
केरल हाई कोर्ट की यह टिप्पणी इसी अंधेरे में रोशनी की तरह है। यह पैâसला देश के संविधान और उसके उन बुनियादी उसूलों से भी सीधे मेल खाता है, जो बराबरी और इंसान की गरिमा की बात करते हैं। कोई भी कानून या समाज किसी औरत को ऐसे रिश्ते में घिसटते रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, जिसकी डोर कब की टूट चुकी हो। जहां रिश्ते बोझ बन गए हों।
यह किसी मजहब में दखल या किसी परंपरा पर हमला नहीं है, बल्कि उस सच्चे इंसाफ की पुनर्स्थापना है, जिसे सदियों पहले लिखा तो गया था, लेकिन समाज ने भुला दिया। रिश्ते हमेशा दिल और सम्मान से चलते हैं, जब दोनों ही रुखसत हो जाएं तो अलग होने का हक दोनों के पास एक जैसा ही होना चाहिए। केरल हाई कोर्ट का यह फैसला इसी तल्ख हकीकत को बड़े सलीके से सामने रखता है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
