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वोटर सूची से पुलिस के डंडे तक…सुप्रीम कोर्ट ने ४६ याचिकाओं की पूरी गठरी खोल दी!

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों से लेकर प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई तक, जवाबदेही के सवाल अब सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं। कुल ४६ याचिकाओं से जुड़े मामलों में अदालत ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली, विरोध की स्वतंत्रता, पुलिस के व्यवहार और पत्रकारों के अधिकारों से संबंधित प्रश्नों पर जवाब मांगा है। सीसीटीवी फुटेज तथा अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का आदेश भी दिया गया है।
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और कथित मतदाता-विलोपन से संबंधित मामलों में निर्वाचन आयोग तथा तीनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किए गए हैं। याचिकाओं में मतदाता सूची से नाम हटाने और संबंधित प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। अब आयोग के जवाब और रिकॉर्ड से इन आरोपों की न्यायिक पड़ताल आगे बढ़ेगी।
जंतर-मंतर को प्रदर्शनस्थल की सूची से हटाने वाली अधिसूचना भी चुनौती के घेरे में है। इसके साथ प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई और पत्रकारों से जुड़े मामलों में जारी नोटिस प्रशासनिक जवाबदेही की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने से घटनाक्रम की जांच के लिए उपलब्ध रिकॉर्ड बचाए रखने में मदद मिलेगी। इन मामलों में नोटिस जारी होना अंतिम फैसला नहीं है, लेकिन संबंधित संस्थाओं को अदालत के सामने अपना पक्ष रखना होगा।
मतदान से लेकर विरोध दर्ज कराने और उसकी खबर जनता तक पहुंचाने तक, नागरिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न अब सुनवाई के केंद्र में हैं।
४६ याचिकाएं; चार बड़े मोर्चे
एसआईआर: मतदाता सूची पुनरीक्षण और कथित नाम-विलोपन पर सवाल।
जंतर-मंतर: प्रदर्शनस्थल संबंधी अधिसूचना और विरोध के अवसर की पड़ताल।
पुलिस कार्रवाई: प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार और कार्रवाई की जवाबदेही।
प्रेस स्वतंत्रता: पत्रकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई; सीसीटीवी तथा अन्य डिजिटल साक्ष्य के संरक्षण का निर्देश।
डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने पर जोर
अदालत की ओर से डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश भी महत्वपूर्ण है। प्रदर्शन स्थलों के वीडियो, सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड किसी घटना की वास्तविक परिस्थितियों को समझने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे साक्ष्य समय के साथ नष्ट या अनुपलब्ध हो सकते हैं, इसलिए उन्हें सुरक्षित रखना निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज से जरूरी है। अब इन मामलों में संबंधित पक्षों के जवाब और अदालत की आगे की सुनवाई पर नजर रहेगी। ४६ याचिकाओं से जुड़े विवादों में अंतिम निर्णय आने से पहले आरोपों को साबित हुआ नहीं माना जा सकता।

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