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संपादकीय : अकाल का मजाक!

गरीबों के जख्मों पर नमक कैसे छिड़का जाता है, यह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से सीखा जाना चाहिए। अकाल का दावानल भड़क उठा है। इंसानों और मवेशियों की जान झुलस रही है और सरकार अकाल राहत पर बैठकों और घोषणाओं की सूखी बारिश करा रही है। फिर वही बात, मदद का हाथ बित्ते भर और उसका ढिंढोरा हाथ भर। श्री फडणवीस ने अकाल पीड़ितों पर बड़ी ही मेहरबानी की है। उनकी सरकार का कहना है कि वह किसानों को दिवाली से पहले पांच-पांच हजार रुपए की मदद देगी। इस भारी-भरकम मदद का ढिंढोरा इस तरह पीटा जा रहा है कि लोगों को यह पांच हजार का आंकड़ा पांच लाख जैसा लगे। इन पांच हजार रुपयों से किसानों की जिंदगी में खुशियों की बहार आ जाएगी, किसान परिवार खुश हो जाएगा और उनकी दिवाली मीठी हो जाएगी। सवा करोड़ किसानों को इस पांच हजारी मदद का लाभ मिलेगा, ऐसा फडणवीस और उनके लोगों को लगता है, तो उन्हें ग्रामीण महाराष्ट्र के तबाह हो चुके किसान भाइयों की हालत का अंदाजा ही नहीं है। पानी की किल्लत अभी से शुरू हो चुकी है। महंगाई का शोला भड़क रहा है। किसान कर्ज के बोझ तले दब चुका है। जेवर-पाती बेचकर, गिरवी रखकर उसने जो बुआई की थी, वह जलकर खाक हो गई। इस अकाल के कारण उसके
जेब में छेद
हो गए हैं, यह एक मजाक और किसानों की ठिठोली है। जरूरी चीजों से लेकर कपड़े-लत्ते तक, हर चीज के दाम रोज बढ़ रहे हैं। ऐसी हालत में सरकार के इस पांच हजार रुपए से किसानों की दिवाली मीठी और खुशहाल कैसे हो सकती है? सिर्फ दिवाली के पकवानों के लिए लगने वाला राशन-पानी लेने जाएं, तो भी वह इतने में नहीं आएगा। अगर किसानों के घर में मिष्ठान-पकवान न बन सके, कम से कम वह अपने बच्चों के लिए नए कपड़े भी न खरीद सके, तो यह सरकार किस मुंह से ‘हमने किसानों की दिवाली खुशहाल बना दी’ ऐसी डींगें हांक रही है? अकाल पीड़ित किसानों की हालत इस वक्त जितनी दयनीय है, उतनी कभी नहीं थी। राज्य के ३०० से ज्यादा तालुकाओं को सरकार ने अकाल पीड़ित घोषित किया है। इन तमाम तालुकाओं का हर किसान जिंदगी की जंग लड़ रहा है। न खरीफ की फसल हुई, न रबी की। इसलिए अगले सात-आठ महीने बीवी-बच्चों का पेट कैसे भरें, दूसरे खर्चे कैसे चलाएं, मवेशियों को कैसे जिंदा रखें, ऐसे अनगिनत सवाल अन्नदाता के सामने खड़े हैं। इनके जवाब उसे सरकार से मिलने की उम्मीद है। मगर यह सरकार सिर्फ
घोषणाओं की लफ्फाजी
कर रही है। पांच हजार रुपए की ‘दिवाली भेंट’ का एलान करके किसानों के तमाम सवालों के जवाब देने का नाटक कर रही है। ऊपर से सरकार जिसे मदद कह रही है, वह तो असल में ‘एडवांस’ है। यानी किसानों को केंद्र सरकार से जो मदद मिलनेवाली है, उसी में से पांच हजार रुपए अब राज्य सरकार ने दिए हैं। इसे ‘मदद’ वैâसे कहा जा सकता है? जो पैसे देने ही हैं, उसी का एक हिस्सा पहले दे देना, उस पर मदद का मुलम्मा चढ़ा देना और ‘केंद्र से फंड आने का इंतजार किए बिना हमने किसान की दिवाली मीठी कर दी’, यह कहकर खुद ही अपनी पीठ थपथपा लेना! एक तरफ किसानों का ऐसा मजाक उड़ाया जा रहा है तो उधर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के साथ भी सरकार ने मजाक ही किया और है। दिवाली की भेंट के तौर पर उन्हें ‘दो हजार’ रुपए दिए जाने वाले हैं। किसानों को पांच हजार और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को दो हजार रुपए की मदद ‘दिवाली भेंट’ के रूप में देकर फडणवीस सरकार ने अपनी बुद्धि का दिवाला निकाल दिया है। किसानों को मिलने वाले कुल पैसों में से ही पांच हजार रुपए का एक टुकड़ा ‘एडवांस’ के रूप में सरकार ने किसान के मुंह पर फेंका है। देवाभाऊ, आज की महंगाई की आग में दो-पांच हजार रुपयों में दिवाली वैâसे मनाई जा सकती है? मोदी के सेवा संकल्प अभियान के लिए हर जिले को ५० लाख का ‘जेबखर्च’ देने वाली यह सरकार किसानों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को दिवाली के लिए सिर्फ पांच और दो हजार रुपए दे रही है। यह मदद नहीं है। यह उनका मजाक है। अकाल का मजाक है!

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