राजन पारकर
14 अप्रैल आते ही माहौल कुछ अलग सा हो जाता है… सड़कों पर लहराते नीले झंडे, कानों में गूंजता “जय भीम” का नारा, और हर चेहरे पर दिखाई देने वाला गर्व…यह दिन केवल एक उत्सव नहीं है — यह दिन है स्वाभिमान, जागरूकता और विचारों का।
यह दिन है डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के जन्म का…
उस महान व्यक्तित्व का, जिन्होंने अपना पूरा जीवन इंसानियत के लिए समर्पित कर दिया…
जिन्होंने अन्याय के अंधेरे में रोशनी दिखाई…और सिखाया — “इंसान बनकर जीना ही सबसे बड़ी पहचान है।”
लेकिन सच कहें तो…
इस पूरे उत्साह और जश्न के बीच एक बात कहीं न कहीं छूट जाती है…
और वह है — बाबासाहेब के विचारों को सच में समझना और जीना।
आज हम बड़े गर्व से कहते हैं — “हम बाबासाहेब को मानते हैं।”
लेकिन साथ ही एक शर्त भी जोड़ देते हैं — “इसके लिए बौद्ध होना जरूरी है।”
और यहीं हम सबसे बड़ी गलती कर बैठते हैं…
क्योंकि बाबासाहेब को मानने के लिए “बौद्ध” होना जरूरी नहीं है…
“बुद्धि” होना जरूरी है।
जिसके मन में सवाल उठते हैं…
जिसे अन्याय देखकर बेचैनी होती है…
जो हर इंसान को बराबरी से देखता है…
वह किसी भी धर्म का हो — वह बाबासाहेब का ही है।
14 अप्रैल हमें सिर्फ जश्न मनाना नहीं सिखाता…
यह दिन हमें खुद से सवाल करना भी सिखाता है…
यह पूछता है —
“क्या तुम सच में बदल रहे हो?”
“क्या तुम आज भी भेदभाव करते हो?”
“क्या तुम शिक्षा को महत्व दे रहे हो?”
क्योंकि बाबासाहेब के विचार केवल भाषणों में नहीं…
बल्कि हमारे व्यवहार में दिखने चाहिए।
आज हम रैलियां निकालते हैं, फोटो लगाते हैं, सोशल मीडिया पर संदेश लिखते हैं…
यह सब अच्छा है… लेकिन यह काफी नहीं है…
बाबासाहेब को सच्ची श्रद्धांजलि तब मिलती है —
जब हम किसी गरीब बच्चे को पढ़ने में मदद करते हैं…
जब हम किसी लड़की को बराबरी से जीने का हक देते हैं…
जब हम अन्याय के खिलाफ चुप नहीं रहते…
कुछ लोग खुद को बौद्ध कहते हैं… लेकिन उनके व्यवहार में अब भी भेदभाव नजर आता है…
और कुछ लोग किसी भी धर्म के नहीं होते… लेकिन उनके दिल में इंसानियत भरी होती है…
तो असली बाबासाहेब का अनुयायी कौन है…?
जवाब बहुत सीधा है —
जो इंसान “इंसानियत” के साथ जीता है… वही बाबासाहेब का सच्चा अनुयायी है।
बाबासाहेब ने कभी नहीं कहा — “मेरा धर्म अपनाओ, तभी मेरे बनोगे…”
उन्होंने कहा — “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।”
क्या यह संदेश किसी एक धर्म के लिए है? बिल्कुल नहीं… यह हर इंसान के लिए है।
इसलिए 14 अप्रैल हमें एक ही बात समझाता है —
बाबासाहेब को धर्म की सीमाओं में मत बांधो…
उनके विचारों को अपने जीवन में उतारो…
आज इस 14 अप्रैल पर… दिल से एक छोटा सा संकल्प लें…
सिर्फ “जय भीम” कहना नहीं है…
बल्कि “जय भीम” जीना है…
क्योंकि —
“बुद्ध” एक रास्ता हो सकता है…
लेकिन “बुद्धि” ही असली पहचान है…
आइए… इस 14 अप्रैल को सिर्फ मनाएं नहीं…
बल्कि अपने अंदर एक बदलाव लाएं…
क्योंकि जब सोच बदलती है…
तो समाज बदलने में देर नहीं लगती…
और तभी बाबासाहेब सच में जिंदा रहते हैं —
हमारे हर काम में… हमारी हर सांस में…!
