सना खान
शाम ढल रही थी। बस स्टैंड पर रोज की तरह भीड़ थी। कोई घर लौटने की जल्दी में था, तो कोई सफर की तैयारी में। एक बुजुर्ग अपने हाथ में पुराना-सा कपड़े का बैग लिए टिकट खिड़की के सामने खड़े थे। उन्होंने कई बार अपनी जेब टटोली। सिक्के गिने, फिर दोबारा गिने। किराए से कुछ रुपए कम थे।
खिड़की बंद होने वाली थी। उन्होंने धीमी आवाज में क्लर्क से कहा, ‘बेटा, अगर अगली बार दे दूं तो…?’ क्लर्क ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘बाबा, नियम सबके लिए एक जैसे हैं।’ बुजुर्ग चुपचाप पीछे हट गए। उनके चेहरे पर पैसे कम होने का दुख कम था, लेकिन लोगों के सामने असहाय हो जाने की झिझक ज्यादा थी। तभी लाइन में खड़े एक युवक ने बिना कुछ कहे दो टिकट खरीदे। एक टिकट उसने अपनी जेब में रखा और दूसरा चलते-चलते बुजुर्ग के बैग की बाहरी जेब में डाल दिया।
कुछ देर बाद जब बुजुर्ग ने टिकट देखा, तो वे घबरा गए। उन्होंने भीड़ में उस युवक को ढूंढ़ लिया। ‘बेटा, यह टिकट तुम्हारा है। मैं किसी का एहसान नहीं लेना चाहता।’ युवक मुस्कुराया और बोला, ‘यह एहसान नहीं है मैं सिर्फ एक पुराना वादा निभा रहा हूं।’ इतना कहकर वह बस में चढ़ गया। बस आ चुकी थी। दोनों अलग-अलग सीटों पर बैठ गए। पूरे रास्ते उनके बीच कोई बातचीत नहीं हुई। बस की खिड़की से बुजुर्ग कई बार उस युवक की ओर देखते रहे, लेकिन युवक हर बार मुस्कुराकर नजरें झुका लेता। शायद दोनों बिना कुछ कहे एक-दूसरे को समझ चुके थे। कई साल बाद वही युवक अपने बेटे के साथ उसी बस अड्डे से गुजर रहा था। उसने देखा कि एक कॉलेज का छात्र चुपचाप एक मजदूर के लिए टिकट खरीद रहा है।
बेटे ने पूछा, ‘पापा, उसने ऐसा क्यों किया?’ युवक कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, ‘जब मैं दस साल का था, मेरी मां के पास भी टिकट के पैसे कम पड़ गए थे। उस दिन एक अनजान व्यक्ति ने हमारी मदद की थी। उसने पैसे नहीं लिए। जाते-जाते सिर्फ इतना कहा था, ‘जब कभी मौका मिले, किसी और के लिए यही कर देना।’ उस दिन मुझे समझ नहीं आया था कि एक छोटा-सा काम कितनी दूर तक जा सकता है। आज समझ आया कि नेकी लौटती नहीं, आगे बढ़ती है।’
बेटे ने अपने पिता का हाथ कसकर पकड़ लिया। उस दिन उसे समझ आया कि दुनिया सिर्फ कानूनों और पैसों से नहीं चलती, बल्कि उस अनदेखी नेकी से भी चलती है, जिसका कोई नाम नहीं होता, कोई पहचान नहीं होती और बदले में कोई उम्मीद भी नहीं होती। कुछ मददें लौटाई नहीं जातीं, आगे बढ़ाई जाती हैं। शायद इसी तरह इंसानियत पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिंदा रहती है।
