एड. राजीव मिश्र, मुंबई
हमरे गांव के रामदीन बड़ा सोझ मनई अहइ। दिन रात मेहनत-मजूरी कइके आपने परिवार पालि रहा है। एक दिन रामदीन घर से बाजार की ओर जात रहे तो रस्ते में रामदीन के साइकिल दरोगा जी की मोटरसाइकिल छुवाइ गई। बस, फिर का रहा? कानून के पूरा पहाड़ रामदीनवा के छाती पर टूटि पड़ा। दरोगा जी गरजिन, ‘अबे ओए! तोहार आंखि फूटि गय रही का? सरकारी पुलिस से टकराय चला है?’ रामदीन हाथ जोड़िके बोला, ‘हुजूर, गलती होइ गय। हम गरीब आदमी हई, माफ किहा जाय माई बाप ।’ दरोगा जी मूंछ ऐंठिके बोले, ‘गरीब हौ त सड़क पर काहे निकरत हौ? गरीबन का सड़क पर चले का परमिशन लिया है?’ रामदीन धीरे से बोला, ‘हुजूर, सड़क सबके खातिर बनी है।’ बस, इतने सुनते ही दरोगा जी के माथा पर बल पड़ि गवा। बोले, ‘बहुत कानून जानत हौ! चल, थाने मा बतावत हई कि सड़क के मालिक कौन है!’ रामदीन हाथ जोरि के दरोगा साहब के पैरन में गिरि पड़ा, ‘मालिक आपै हउवैं सरकार! हम त बस पेट के खातिर मजदूरी करे जात रहेन।’ दरोगा जी बोले, ‘अच्छा! त पेट भरै खातिर कानून तोड़ब?’ रामदीन कहिस, ‘हुजूर, पेट खाली होय त कानून का, संविधान का, सब किताब धुंधली देखाय लागति हैं!’ थोड़ी देर बाद दरोगा जी कहिन, ‘चल, पांच सौ रुपिया निकाल, मामला रफा-दफा करित हर्इं।’ रामदीनवा जेब खंगारिस, बीस रुपिया, एगो फटा रुमाल अउर भगवान के फोटो निकरा। बोला, ‘हुजूर, रुपिया त नाहीं, ई भगवान हैं। चाही त इनहूं का गवाही मा धरि ल्या!’ दरोगा जी झल्लाइके बोले, ‘भाग यहां से!’ रामदीन साइकिल उठाइस अउर चलि पड़ा। रास्ते भर सोचत रहा गरीब के गलती अपराध, अमीर के गलती हादसा अउर वर्दी वाले की गलती सरकारी कार्रवाई! गांव पहुंचिके मेहरारू पूछिस, ‘का भवा?’ रामदीनवा बोला, ‘कुछ नाहीं, आज लोकतंत्र के दर्शन कइके आए हई। पता चला कि कानून अंधा नाहीं है, बस गरीबन के देखै खातिर ओकर चश्मा टूटि गवा है!’ अउर सच कहें, गांव मा आजऊ कानून के किताब सबके घरे मिलि जाई, मुला ओकर असली मतलब दरोगा जी के डंडे से ही समझ मा आवत है!
